बस्ती चुनाव: हरीश द्विवेदी की हार में अपनों की नाराजगी की भूमिका

बस्ती। 2014 और 2019 के चुनावों में जो लोग हरीश द्विवेदी के साथ जुड़े थे, वे उनकी अनदेखी के कारण नाराज हो गए और धीरे-धीरे उनसे दूरी बना ली। टिकट को लेकर जिले के कई वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी भी खुलकर सामने आई। पार्टी ने भी कुछ ऐसे फैसले लिए, जिससे जिले में भाजपा की टीम कमजोर हो गई। हार का एक बड़ा कारण भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष दयाशंकर मिश्र का विरोध था।

अपनों से दूरी के चलते हरीश द्विवेदी को जीत की हैट-ट्रिक लगाने के बजाय हार का सामना करना पड़ा। जिन्होंने पहले साथ रहकर उन पर भरोसा जताया था, उनसे रिश्ता टूट गया। चुनाव में वे कहीं भी साथ नजर नहीं आए। हरीश ने जिन लोगों पर आंख मूंदकर भरोसा किया था, वे समय के साथ कदम से कदम मिलाकर चलते रहे, लेकिन उनके दिल के जख्मों पर मरहम लगाने में सफल नहीं हो पाए। यही कारण रहा कि वह बड़े अंतर से चुनाव हार गए।

बात तब शुरू होती है जब राम प्रसाद चौधरी के भतीजे अरविंद चौधरी वर्ष 2009 में बस्ती से सांसद बने। उन पर पूरे पांच वर्ष यह आरोप लगता रहा कि उनका जनता से न कोई सरोकार रहा और न ही उनकी अपेक्षा के मुताबिक सामाजिक रूप से उपस्थिति हो पाई। लेकिन हरीश द्विवेदी लगातार राजनीतिक और सामाजिक रूप से सक्रिय रहे, जिसका परिणाम था कि 2014 के मोदी लहर में जनता ने उन्हें चुनकर संसद में भेज दिया। दूसरी बार भी वह सफल रहे, लेकिन 2014 और 2019 के चुनावों में जो लोग उनके साथ जुड़े थे, वे उनकी अनदेखी के कारण नाराज हो गए और धीरे-धीरे दूरी बना ली।

टिकट को लेकर जिले में कई वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी खुलकर सामने आई। पार्टी ने भी कुछ ऐसे फैसले लिए, जिससे जिले में भाजपा की टीम कमजोर हुई। अंतिम दौर में पार्टी में ऐसे लोगों को शामिल कराया गया, जिनका पार्टी के ही स्तर पर विरोध खुलकर सामने आया। हरीश द्विवेदी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को मनाने के साथ-साथ दूसरे दलों से आए हुए नेताओं के सहयोग से समीकरण साधने में लगे रहे, लेकिन वे अंदरखाने अपने ही खिलाफ बिछाई जा रही बिसात को भांपने में सफल नहीं हो पाए।

लोग आश्वासन और भरोसा देते रहे। कुछ पूर्व विधायकों और पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारियों ने भी विरोध किया। कुछ मंच पर दिखते थे, तो कुछ मंच से भी किनारा किए रहे। हार का एक कारण भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष दयाशंकर मिश्र का विरोध में आ जाना रहा। पहले तो उन्हें बसपा ने अपना प्रत्याशी बनाया, लेकिन नामांकन के अंतिम दिन अचानक उनका टिकट कट गया। दयाशंकर मिश्र ने हरीश पर टिकट कटवाने का आरोप लगाया। चुनाव प्रचार के दौरान सपा गठबंधन के प्रत्याशी लगातार आरक्षण और संविधान संशोधन को लेकर हमला बोलते रहे, लेकिन इसके जवाब में भाजपा प्रत्याशी समेत बड़े नेताओं ने चुप्पी साध ली। इसके चलते बसपा का बड़ा वोट बैंक सीधे सपा गठबंधन की तरफ शिफ्ट हो गया और भाजपा उन मतदाताओं को समझाने में सफल नहीं हो पाई, जो आरक्षण और संविधान संशोधन को लेकर आशंकित थे।

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