ग्राम पंचायतें भारतीय लोकतंत्र की असली जड़ें हैं। संविधान ने इन्हें तीसरे दर्जे की सरकार का दर्जा देकर यह संदेश दिया कि गाँव ही लोकतंत्र की असली प्रयोगशाला हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब पंचायतों को मजबूत बनाने के लिए योजनाएँ बनती हैं, तो क्या वे सचमुच अपने उद्देश्य को हासिल करती हैं? उत्तर प्रदेश सरकार की “मुख्यमंत्री पंचायत प्रोत्साहन पुरस्कार योजना” इसी प्रश्न का ज्वलंत उदाहरण है।
कागज़ पर यह योजना बेहतरीन दिखती है, लेकिन जमीनी अमल पर संदेह गहराते जा रहे हैं। इस पुरस्कार योजना का उद्देश्य था कि हर जिले से पाँच पंचायतें चुनी जाएँ, जिन्हें उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए सम्मानित किया जाए। चयनित पंचायतों को प्रशस्ति पत्र के साथ-साथ 10 से 35 लाख रुपये तक का अतिरिक्त अनुदान भी मिले,
ताकि वे विकास और आय-वृद्धि के नए अवसर पैदा करें। सरकार की मंशा यह थी कि ये पंचायतें जिले की अन्य पंचायतों के लिए आदर्श मॉडल बनें और प्रतियोगिता की स्वस्थ भावना विकसित हो। पंचायतों का कार्यक्षेत्र व्यापक है—सड़क, बिजली, पानी, सफाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला व बाल कल्याण तक। अगर इन्हीं कामों को कसौटी मानकर पुरस्कार दिया जाए, तो यह न केवल सम्मान होगा,
बल्कि काम को और तेज़ी से करने की प्रेरणा भी बनेगा। यही सोचकर इस योजना की रूपरेखा बनाई गई। चयन प्रक्रिया को वैज्ञानिक और निष्पक्ष बनाने की कोशिश की गई। आवेदन करने वाली पंचायतों को राज्य पोर्टल पर 50 सवालों की प्रश्नावली भरनी होती है। मूल्यांकन 9 थीम्स पर आधारित होता है और कुल 100 अंकों में अंक दिए जाते हैं। न्यूनतम पात्रता सीमा 60% अंक तय की गई है।
नौ थीमों का सार यह है कि ग्राम पंचायत का समग्र विकास तभी संभव है जब वह गरीबी-मुक्त हो और बेहतर आजीविका के अवसर उपलब्ध कराए, ताकि रोजगार योजनाओं के माध्यम से ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो सके। पंचायत को इतना सक्षम होना चाहिए कि वह स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के लाभ, टीकाकरण और पोषण कार्यक्रमों के जरिए हर परिवार को स्वस्थ जीवन दे सके।
इसके साथ ही पंचायत को बच्चों के प्रति संवेदनशील रहते हुए उन्हें आंगनबाड़ी और स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुरक्षा और विकास का वातावरण प्रदान करना चाहिए। पर्याप्त जल-युक्त पंचायत का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब हर घर तक नल-जल योजना का लाभ पहुँचे, जल संरक्षण की परंपरा मजबूत हो और सभी को स्वच्छ पेयजल सुलभ हो। इसी क्रम में पंचायत का स्वरूप स्वच्छ और हरित होना चाहिए,
जहाँ शौचालयों की सार्वभौमिक उपलब्धता हो, ठोस कचरा प्रबंधन की व्यवस्था कायम हो और वृक्षारोपण तथा पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा दिया जाए। बुनियादी ढाँचे के स्तर पर पंचायत आत्मनिर्भर बने, जिसमें सड़क, बिजली, रोशनी, पंचायत भवन और डिजिटल सुविधा जैसी आधारभूत आवश्यकताओं की समुचित पूर्ति हो। सामाजिक सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जिसके तहत पेंशन और अन्य जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ प्रत्येक पात्र व्यक्ति तक पहुँचे और सामाजिक न्याय की गारंटी सुनिश्चित की जा सके। इन सबके केंद्र में सुशासन होना चाहिए, जो पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करे, ग्रामसभा को सक्रिय बनाए और यह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक सेवा समय पर और प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुँचे।
अंततः एक आदर्श पंचायत वह होगी जो महिला-हितैषी भी बने, जहाँ महिलाओं की सुरक्षा का विशेष ख्याल रखा जाए, स्व-सहायता समूह सक्रिय हों, उन्हें नेतृत्व के अवसर मिलें और समान अधिकारों के साथ उनके योगदान को मान्यता मिले। अर्थात सरकार ने ग्राम पंचायतों को सीधे वैश्विक सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) से जोड़ा है। पंचायत स्तर पर गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य, शिक्षा, स्वच्छता, लैंगिक समानता और सुशासन जैसे विषयों को विकास की कसौटी माना गया।
इन लक्ष्यों की झलक अब गांवों की छोटी-छोटी इकाइयों यानी पंचायतों में भी दिखने लगी है। इसके लिए एक व्यवस्थित चयन प्रक्रिया तय की गई है। प्रत्येक जिले से अधिकतम पाँच पंचायतें ही चुनी जाती हैं और किसी एक विकासखंड से दो से अधिक पंचायतों का चयन नहीं किया जाता। सबसे पहले जिला प्रदर्शन मूल्यांकन समिति (DPAC) आवेदन पत्रों की जाँच करती है और भौतिक सत्यापन करती है,
जिसका गठन संबंधित जिले के जिलाधिकारी द्वारा शासन की गाइड लाइन के अनुसार की जाती है। इसके बाद राज्य स्तरीय समिति (SPAC) अंतिम निर्णय लेती है और चयनित पंचायतों की सूची जारी करती है। कागज़ पर यह पूरी प्रक्रिया बिल्कुल पारदर्शी और निष्पक्ष दिखाई देती है। लेकिन असली सवाल इसके क्रियान्वयन पर उठते हैं। चयन और मूल्यांकन की इस प्रक्रिया को लेकर गांव के स्तर पर जो अनुभव सामने आते हैं, वे अक्सर कागज़ी पारदर्शिता से मेल नहीं खाते।
बस्ती का मामला: विवाद और अविश्वास
बस्ती जिले में वर्ष 2024 के लिए चयनित पंचायतों को लेकर शुरुआत से ही विवाद खड़ा हो गया। आरोप लगे कि चयनित पंचायतें पुरस्कार की कसौटी पर खरी नहीं उतरतीं। शिकायतें आईं कि बिना भौतिक सत्यापन के फाइलें फ्रीज़ कर दी गईं, फर्जी तस्वीरें और दस्तावेज़ प्रस्तुत किए गए। आपत्ति के अनुक्रम में जांच बैठाई गई और प्रारंभिक स्तर पर चयन पर रोक भी लगी। उस समय लगा कि प्रक्रिया पारदर्शी होगी और वास्तविक सच्चाई सामने आएगी। लेकिन जांच का नतीजा अब भी ढाक के तीन पात बना हुआ हैं।
इससे यह धारणा मज़बूत हुई कि नौकरशाही ने गंभीरता से मामले को नहीं लिया और पूरी प्रक्रिया महज औपचारिकता बना रखा हैं। यह घटना न केवल पंचायत प्रोत्साहन पुरस्कार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करती है, बल्कि मेहनत से काम करने वाली अन्य पंचायतों के उत्साह को भी तोड़ देती है। अगर आदर्श पंचायत का चयन ही संदिग्ध होगा, तो यह योजना प्रेरणा के बजाय हताशा फैलाएगी। नौकरशाही की भूमिका और उसका कमज़ोर अमल योजना की सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है। योजना का ढांचा भले ही मज़बूत और दूरदर्शी बनाया गया हो, लेकिन उसकी आत्मा तभी जीवित रहती है
जब अमल ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ किया जाए। अभी हालात इसके उलट हैं। कई बार डिजिटल साक्ष्य बिना जियो-टैग और टाइम-स्टैम्प के स्वीकार कर लिए जाते हैं, जिससे प्रमाणिकता पर सवाल खड़े होते हैं। फील्ड वेरिफिकेशन केवल औपचारिकता बनकर रह गया है, ज़मीनी हक़ीक़त की जांच का उद्देश्य ही पूरा नहीं होता। आपत्तियों और अपील का निस्तारण भी पारदर्शी ढंग से न हो पाने के कारण भरोसा डगमगाने लगता है। परिणाम यह होता है कि योजना का असली मकसद खो जाता है,
अच्छी पंचायतें पीछे छूट जाती हैं और चयन प्रक्रिया संदेहों के घेरे में आ जाती है। ग्राम पंचायतें लोकतंत्र की पहली सीढ़ी हैं। अगर इन्हें आदर्श बनाना है तो चयन प्रक्रिया को न सिर्फ पारदर्शी बल्कि प्रेरणादायक बनाना होगा। “मुख्यमंत्री पंचायत प्रोत्साहन पुरस्कार” सिर्फ राशि देने का औजार नहीं है, यह विश्वास का निवेश है। अगर यह भरोसा टूटेगा, तो पंचायती व्यवस्था पर ही लोगों का विश्वास डगमगा जाएगा।दरअसल, इस योजना का असली मूल्य केवल वित्तीय अनुदान में नहीं, बल्कि उस संदेश में है जो यह बाकी पंचायतों को देता है। एक आदर्श पंचायत की मिसाल देखकर जब अन्य पंचायतें उसी राह पर चलने की कोशिश करेंगी, तभी यह चक्र विकास और सुशासन का बनेगा। लेकिन अगर उदाहरण ही संदेहास्पद हों, तो प्रेरणा की जगह उपहास पनपेगा।
यह पुरस्कार तभी सार्थक होगा जब आदर्श पंचायतें सिर्फ कागज़ पर नहीं, बल्कि जमीन पर काम करती दिखें। सरकार को चाहिए कि वह नियम पुस्तिका से आगे बढ़कर ईमानदार क्रियान्वयन सुनिश्चित करे। तभी यह योजना वास्तव में गाँवों के लिए विकास का वाहक बनेगी और लोकतंत्र की जड़ों को और गहराई देगी। अन्यथा यह योजना भी उन योजनाओं की तरह हो जाएगी, जिनका नाम तो बहुत है, लेकिन असर गाँव की गलियों में नहीं दिखता।
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