ट्रेनिंग में अपाहिज कैडेट्स को चपरासी से भी कम पैसा:खुद करा रहे इलाज; एक्‍स-कैडेट्स की मांग- एक्‍ट है तो पेंशन दीजिए

18 अगस्‍त को सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा, ‘ट्रेनिंग के दौरान एक्सीडेंट होने और चोट लगने की वजह से जिन कैडेट्स को डिफेंस फोर्सेज में शामिल नहीं किया जाता, उन्हें यूं ही अपने हाल पर नहीं छोड़ सकते। सरकार को मेडिकल खर्चों और साथ ही दूसरी नौकरी दिलाने में भी इनकी मदद करनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्‍पणी उन तमाम कैडेट्स के लिए राहत देने वाली है, जो कभी आर्मी में भर्ती होने की इच्छा रखते थे, मगर ट्रेनिंग में चोटिल होकर एक्‍स-कैडेट्स बन गए।

एक्‍स-सर्विसमैन नहीं, एक्‍स-कैडेट्स कहलाते हैं

सेना से रिटायर सैनिकों को एक्स-सर्विसमैन कहा जाता है। मगर आर्मी में भर्ती से पहले ट्रेनिंग के दौरान चोटिल कैडेट्स को एक्स-कैडेट्स कहा जाता है। एक्स-सर्विसमैन को पेंशन और मिलिट्री हॉस्पिटल्स में इलाज जैसी कई सुविधाएं मिलती हैं जो एक्‍स-कैडेट्स को नहीं मिलतीं।

ऐसे तमाम कैडेट्स हैं जो ट्रेनिंग के दौरान ही चोट खाकर बोर्ड-आउट हो गए और सालों से अपने खर्च पर अपना इलाज करा रहे हैं। इन्‍हीं एक्‍स-कैडेट्स के केसेज पर सुप्रीम कोर्ट ने स्‍वत: संज्ञान लिया है और सरकार को इनके लिए पॉलिसी बनाने को कहा है। अगली सुनवाई 4 सितंबर को होनी है।

1985 से आज तक लगभग 500 कैडेट्स बोर्ड आउट हुए हैं। 1996 तक एक्स-कैडेट्स को केस-टु-केस बेसिस पर डिसएबिलिटी पेंशन दी जाती थी। इसके बाद एक्स-ग्रेशिया का प्रावधान लाया गया।

एक्स-कैडेट्स को चपरासी की सैलरी का 50%

एक्स-कैडेट को आज जो एक्स-ग्रेशिया मिलता है, उसके दो कंपोनेंट हैं-

  • सर्विस एलिमेंट- 9,000 रुपए। यह मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस द्वारा निर्धारित किय गया है जो केंद्र सरकार के ग्रुप सी के कर्मचारी के वेतन का 50% है।
  • डिसएबिलिटी एलिमेंट- 16,400 रुपए। यह पे कमिशन ने निर्धारित किया है। यह कैडेट के स्टाइपेंड का 30% है।

100% डिसएबल्ड कैडेट्स को 39-40 हजार रुपए के आस-पास महीने में मिलते हैं। जो ज्यादातर डिसएबल्ड कैडेट्स हैं उन्हें 9,000+16,400= 25,400 रुपए ही मिलता है, जो एक रिक्रूट से भी कम है। आज केंद्र सरकार के चपरासी की जो सैलरी है, उसका 50% कैडेट को दिया जाता है।

सुनवाई के दौरान एक्स-कैडेट्स को रिप्रेजेंट कर रही एडवोकेट ऋचा सिंह ने बताया, ‘कैडेट्स ग्रेड-ए ऑफिसर की तैयारी करते हैं लेकिन एक्स-ग्रेशिया उन्हें ग्रेड-डी कर्मचारी के आधार पर दिया जाता है। बाकी फोर्सेज जैसे BSF, ITBP और रिक्रूट्स के साथ ऐसा नहीं होता।’

पिता की चिता पर सैनिक बनने की कसम खाई थी, आज एक्‍स-कैडेट हूं

1996 में NDA से बोर्ड आउट हुए अंकुर चतुर्वेदी सालों से इस समस्या को लेकर आवाज उठा रहे हैं। वो कहते हैं, ‘आज यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच पाया और इसका श्रेय मैं नेशनल डिफेंस एकेडमी को देना चाहता हूं। वहां सभी कैडेट्स को हार न मानना सिखाया जाता है जो एकेडमी के बाहर सिविलियन जिंदगी में भी हमारे काम आता रहा है।’सभरवाल कमेटी ने 2015 में कहा- एक्स कैडेट्स के साथ हो रहा भेदभाव

साल 2015 में मनोहर पर्रिकर देश के रक्षा मंत्री थे। उसी साल मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस के अंतर्गत बनाई गई सभरवाल कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में माना कि….

  • बोर्ड-आउट होने वाले कैडेट्स को डिसएबिलिटी पेंशन दी जाती है, लेकिन चौंकाने वाली बात है कि इसे पेंशन न कहकर मंथली एक्स-ग्रेशिया अवार्ड कहा जाता है।
  • ग्रुप ए ऑफिसर के तौर पर भर्ती के लिए तैयारी कर रहे इन कैडेट्स को ग्रुप सी के रिक्रूट्स यानी सिपाहियों से भी कम एक्स-ग्रेशिया अमाउंट दिया जाता है।
  • ट्रेनिंग के दौरान अगर रिक्रूट्स डिसएबल होते हैं तो उन्हें एक्स-सर्विसमैन का दर्जा मिलता है, जबकि कैडेट्स को वो दर्जा नहीं मिलता। यह भेदभावपूर्ण है।
  • CAPF यानी सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज के ट्रेनी को भी डिसएबल होने पर डिसएबिलिटी पेंशन दी जाती है।
  • डिसएबिलिटी पेंशन प्राप्त करने के लिए मिनिमम सर्विस का कोई क्राइटेरिया नहीं है।

कमेटी ने इन पॉइंट्स को ध्यान में रखते हुए कुछ सुझाव भी दिए थे….

एक्स-कैडेट्स को प्रोफेशनल कोर्स करने में मदद की जाए ताकि सेना से बाहर होने के बाद वो वापस कोई नौकरी पा सकें।

एक्स-कैडेट्स को एक्स-ग्रेशिया की जगह डिसएबिलिटी पेंशन दी जाए, ताकि वो एक्स-सर्विसमैन का दर्जा प्राप्त कर सकें और एक्स-सर्विसमैन को मिलने वाली सुविधाएं उन्हें मिल सकें।

इससे एक्स-कैडेट्स और डिसएबल होने वाले रिक्रूट्स के बीच का अंतर नहीं रहेगा।

सरकार 4 सितंबर तक स्कीम बनाए- सुप्रीम कोर्ट

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि सरकार को ट्रेनिंग करने वाले सभी कैडेट्स को इंश्योरेंस कवर देने के बारे में विचार करना चाहिए ताकि एक्सीडेंट और चोट लगने की स्थिति में उन्हें पैसे की समस्या न हो।

इसी के साथ चोटिल कैडेट्स को या तो डिफेंस फोर्सेज में ही डेस्क की नौकरी दी जाए या दूसरी नौकरियों के लिए उन्हें तैयार किया जाए। कोर्ट ने सरकार को 4 सितंबर तक एक्स-कैडेट्स के लिए स्कीम बनाने का समय दिया है।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार को एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एश्वर्या भाटी रिप्रेजेंट कर रही थीं। उन्होंने कहा कि वो संबंधित विभागों से बात कर अगली सुनवाई तक इसका समाधान लेकर आएंगी। उन्होंने यह भी कहा कि मिलिट्री में डेस्क की नौकरी के लिए भी नॉन-कॉम्बैट रोल्स नहीं है। ऐसे में सेना में चोटिल कैडेट्स की भर्ती नहीं की जा सकती।बोर्ड आउट हुए तो डिग्री भी पूरी नहीं होती

ऋचा कहती हैं कि NDA के जरिए भर्ती होने वाले कैडेट्स 4 साल की ट्रेनिंग करते हैं। इस दौरान तीसरे साल में भी अगर उन्हें चोट लगती है तो बोर्ड-आउट कर दिया जाता है। उन्हें डिग्री तक पूरी नहीं करने दी जाती। इससे न सिर्फ उनका समय, पैसा और उम्र के कीमती सालों का नुकसान होता है, बल्कि वो अपने पीयर्स से पीछे भी हो जाते हैं।

NDA के कैडेट्स को JNU की डिग्री मिलती है। यह करिकुलम बाहर के किसी दूसरे कॉलेज से मैच नहीं होता। कुछ प्राइवेट कॉलेज लेटरल एंट्री लेते हैं, लेकिन वहां एक्स्ट्रा फीस जमा करनी होती है। कई बार ढेरों एग्जाम पास करने पड़ते हैं।

साल 2022 में AICTE ने NDA के बोर्ड-आउट कैडेट्स के लिए एक सर्कुलर जारी किया था। इसमें इंजीनियरिंग कॉलेजों से उन्हें लेटरल एंट्री देने की दरख्वास्त की गई थी, लेकिन यह कोई ऑर्डर नहीं है। कॉलेज की मर्जी है कि वो चाहे तो एडमिशन दे सकते हैं, चाहे तो नहीं। ज्यादातर मामलों में कॉलेज एक्स-कैडेट्स को लेटरल एंट्री देने से मना कर देते हैं।

भीख नहीं, इज्जत चाहिए

एक्स-कैडेट्स को वर्तमान में एक्स-ग्रेशिया पेमेंट, यानी अनुभूति अनुदान दिया जाता है। सरकार उन सभी नागरिकों को एक्स-ग्रेशिया पेमेंट देती है जिन्हें किसी आपदा या एक्सीडेंट में नुकसान हुआ है। साथ ही सर्विस के दौरान किसी सरकारी कर्मचारी को चोट लग जाए या उसकी मौत हो जाए, तो उसे भी एक्स-ग्रेशिया पेमेंट किया जाता है।

इसे लेकर अंकुर चतुर्वेदी कहते हैं, ‘सरकार की ओर से हमें एक्स-ग्रेशिया मिलता है यानी भीख। आप क्या एहसान कर रहे हैं हम पर? एक सिपाही को भीख नहीं, इज्जत चाहिए जिसके लिए वो फौज में आता है।’

एक्स-कैडेट्स को मंथली एक्स-ग्रेशिया और मंथली एक्स-ग्रेशिया डिसएबिलिटी अवार्ड। जब एक कैडेट को डिसएबिलिटी होती है तो एक मेडिकल बोर्ड बैठता है जो उसकी डिसएबिलिटी को एग्जामिन करता है। बोर्ड यह जांच करता है कि कैडेट की डिसएबिलिटी सेना की वजह से हुई या सेना की वजह से उसमें इजाफा हुआ।

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Bindesh Yadav
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