30 जनवरी, 2026 को उत्तर प्रदेश के महोबा जिले में एक असामान्य दृश्य देखने को मिला। चरखारी से सत्ताधारी दल भाजपा के विधायक बृजभूषण राजपूत ने अपने समर्थकों के साथ प्रदेश के जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह का काफिला बीच सड़क पर रोक लिया। मुद्दा था—जल जीवन मिशन के अधूरे कार्य, पाइपलाइन बिछाने के बाद टूटी सड़कें, और कई गांवों में अब तक टोटी से जलापूर्ति शुरू न होना। सड़क पर हुई तीखी नोकझोंक के बाद प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा और मंत्री को अधिकारियों के साथ बैठक कर स्थिति की समीक्षा करनी पड़ी। यह घटना केवल एक राजनीतिक टकराव नहीं थी; यह उस खाई को उजागर करती है जो कागज़ों पर चल रही योजनाओं और जमीन पर दिखती वास्तविकता के बीच बन जाती है, जब लोगों की बुनियादी जरूरतें अधूरी रह जाती हैं।

महोबा की यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि जब योजनाओं का लाभ समय पर नहीं पहुंचता, तो स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी अपने ही मंत्रियों से सार्वजनिक रूप से जवाब मांगना पड़ता है। यही संदर्भ जब जनपद बस्ती के विकास खंड बस्ती सदर की ग्राम पंचायत मरहा पर रखा जाता है, तो तस्वीर चौंकाने वाली समानता के साथ सामने आती है। यहाँ भी योजना वही है, आश्वासन वही है, लेकिन परिणाम अब तक अधूरा है।
मरहा में अक्टूबर, 2023 में जल जीवन मिशन के तहत पेयजल परियोजना शुरू हुई थी। उद्देश्य स्पष्ट था—हर घर तक नल से शुद्ध पेयजल पहुंचाना। शुरुआती दिनों में निर्माण कार्य तेजी से शुरू हुआ। गांव के बीच गहरा गड्ढा खोदा गया, ओवरहेड टंकी के लिए पिलर खड़े किए गए और गलियों में पाइपलाइन बिछाने का काम हुआ। ग्रामीणों ने सोचा कि थोड़ी असुविधा के बाद उन्हें स्थायी सुविधा मिलने वाली है। मशीनों की आवाज़, मजदूरों की हलचल और खोदी जा रही सड़कों के बीच लोगों को उम्मीद थी कि कुछ महीनों में उनके घर के आंगन तक पानी की धार पहुंचेगी।

लेकिन समय बीतता गया और निर्माण की रफ्तार धीमी पड़ती गई। फरवरी 2026 तक आते-आते स्थिति यह है कि टंकी अधूरी खड़ी है, गड्ढा जस का तस है, सड़कें टूटी हैं और जलापूर्ति अब भी शुरू नहीं हुई है। 25 सितम्बर, 2023 को शुरू हुए इस कार्य की एक समयरेखा स्वयं कहानी कह देती है। 2023 के अंत तक गड्ढा और पिलर बन गए। 2024 में पाइपलाइन बिछी और सड़कों को खोदा गया। 2025 में निर्माण लगभग ठहर गया। और 2026 में गांव अब भी हैंडपंप पर निर्भर है। लगभग ढाई वर्ष बीत जाने के बाद भी योजना धरातल पर अधूरी पड़ी है।
करीब 2500 की आबादी वाले ग्राम पंचायत मरहा में आज भी लोग हैंडपंप से पानी भरते दिखाई देते हैं। सुबह और शाम हैंडपंप के पास कतारें लगती हैं। महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग—सभी बारी का इंतजार करते हैं। पाइपलाइन डालने के बाद कई स्थानों पर सीसी रोड और इंटरलॉकिंग मार्गों को क्षतिग्रस्त किया गया, लेकिन उनकी मरम्मत मानक के अनुरूप नहीं हुई। कई जगह सड़कें धँस रही हैं, इंटरलॉकिंग उखड़ रही है और बरसात में कीचड़ के कारण आवागमन मुश्किल हो जाता है। जो काम सुविधा देने के लिए शुरू हुआ था, उसने असुविधा को स्थायी रूप दे दिया है।
निर्माण स्थल का गहरा गड्ढा अब सुरक्षा के लिहाज से खतरा बन चुका है। बरसात में यह पानी से भर जाता है और तालाब जैसा रूप ले लेता है। आसपास रहने वाले लोग लगातार भय में रहते हैं कि कहीं कोई बच्चा या पशु उसमें गिर न जाए। ग्रामीण बताते हैं कि कई बार अस्थायी घेराबंदी की गई, लेकिन समय के साथ वह भी हट गई। रात के समय यह स्थान और भी जोखिम भरा हो जाता है।

इस अधूरी परियोजना का असर केवल पानी तक सीमित नहीं है। ग्राम पंचायत में प्रस्तावित इंटरलॉकिंग और सीसी रोड निर्माण कार्य भी रुक गए हैं। ग्राम पंचायत नई सड़कों को बनवाने का जोखिम इसलिए नहीं उठा पा रही है क्योंकि आशंका बनी रहती है कि जल जीवन मिशन के अधूरे कार्य के कारण भविष्य में फिर खुदाई हो सकती है। एक अधूरी योजना ने पूरे ग्राम विकास की गति को रोक दिया है। स्कूल जाने वाले बच्चों को टूटी सड़कों से गुजरना पड़ता है, मरीजों को अस्पताल ले जाने में दिक्कत होती है, और बरसात के दिनों में गांव के कई हिस्से कीचड़ में तब्दील हो जाते हैं।
योजना के दस्तावेज बताते हैं कि इसकी लागत ₹226.31 लाख है। कार्यदायी संस्था उ.प्र. जल निगम (ग्रामीण), बस्ती है और कार्यदायी फर्म JAKSON VISHVARAJ (JV) दर्ज है। वितरण प्रणाली की लंबाई 13.444 किलोमीटर और अवर जलाशय की क्षमता 150 किलोलीटर, ऊंचाई 14 मीटर प्रस्तावित है। कागज़ों पर योजना व्यवस्थित, संतुलित और तकनीकी रूप से सक्षम दिखती है, लेकिन जमीन पर अधूरी टंकी और धँसी सड़कें एक अलग कहानी कहती हैं।
सबसे बड़ा सवाल योजना विवरण में दर्ज “वर्तमान लाभान्वित जनसंख्या 620” को लेकर उठता है। जब टंकी अधूरी है और जलापूर्ति शुरू नहीं हुई, तो ये 620 लोग कैसे लाभान्वित हो रहे हैं? यह आंकड़ा स्वयं निगरानी, रिपोर्टिंग और प्रगति आकलन की व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। क्या यह कागज़ी प्रगति है? या कहीं और से अस्थायी आपूर्ति को लाभान्वित दिखाया गया है? ग्रामीणों के अनुभव इस दावे से मेल नहीं खाते।
यदि योजना और वास्तविकता की तुलना की जाए तो अंतर स्पष्ट है। योजना कहती है—हर घर नल से जल। मरहा में लोग हैंडपंप पर हैं। योजना कहती है—सड़क बहाली। यहां सड़कें धँसी हैं। योजना कहती है—समय पर पूर्णता। यहां ढाई वर्ष बाद भी निर्माण अधूरा है। योजना कहती है—सुरक्षित पेयजल। यहां लोग पुराने स्रोतों पर निर्भर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि शुरू में अधिकारियों और ठेकेदारों की आवाजाही नियमित थी। निरीक्षण होते थे, आश्वासन दिए जाते थे। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता, निगरानी कम होती गई और काम की रफ्तार भी घटती गई। अब कभी-कभार कोई कर्मचारी आता है, स्थिति देखता है और चला जाता है। ग्रामीणों को यह समझ नहीं आता कि काम रुका क्यों है—तकनीकी कारणों से, भुगतान में देरी से, या प्रशासनिक शिथिलता से।

महोबा की घटना यह संकेत देती है कि जब योजनाओं का लाभ समय पर नहीं मिलता, तो जनप्रतिनिधियों को भी मंत्री स्तर पर सवाल उठाने पड़ते हैं। मरहा के ग्रामीणों को भी उम्मीद है कि उनकी समस्या पर इसी गंभीरता से ध्यान दिया जाएगा। वे आश्वासन से आगे बढ़कर कार्य की वास्तविक शुरुआत देखना चाहते हैं। संबंधित विभाग के जिम्मेदार अधिकारी कहते हैं कि शेष कार्य शीघ्र शुरू कराया जाएगा और टंकी बनते ही जलापूर्ति शुरू होगी। लेकिन ग्रामीण अब शब्दों से अधिक काम देखना चाहते हैं।
यह स्थिति प्रशासनिक समन्वय की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है। जलापूर्ति, सड़क मरम्मत, सुरक्षा घेराबंदी, और गुणवत्ता निरीक्षण—ये सभी अलग-अलग जिम्मेदारियां हैं, लेकिन परिणाम एक ही है: गांव की सुविधा। जब तक इन सबके बीच तालमेल नहीं होगा, अधूरे काम लोगों की परेशानी बढ़ाते रहेंगे।
मरहा की यह स्थिति केवल एक गांव की कहानी नहीं है। यह उस अंतर को उजागर करती है जो योजना की मंशा और क्रियान्वयन के बीच पैदा हो जाता है। लोग योजना के खिलाफ नहीं हैं; वे चाहते हैं कि यह योजना सफल हो। वे चाहते हैं कि गड्ढा टंकी बने, टंकी पानी दे, सड़कें समतल हों और “हर घर जल” का सपना सच में हर घर तक पहुंचे।
आज मरहा उस दिन की प्रतीक्षा कर रहा है जब अधूरी खड़ी टंकी गांव की प्यास बुझाएगी, जब हैंडपंप की कतारें घटेंगी, जब सड़कों पर धँसाव नहीं होगा और जब बरसाती पानी से भरा गड्ढा नहीं, बल्कि स्वच्छ जल की धारा हर आंगन तक पहुंचेगी। तब शायद यह गांव कह सकेगा कि जल जीवन मिशन सच में उनके जीवन का हिस्सा बना—कागज़ों में नहीं, जमीन पर।
✍️ अखिल कुमार यादव














