उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद से होकर बहने वाली रवई नदी को प्रायः एक छोटी, मौसमी और स्थानीय जलधारा के रूप में देखा गया है। यही दृष्टि इसकी सबसे बड़ी त्रासदी भी रही है। वास्तविकता यह है कि रवई नदी केवल कुछ गाँवों या एक जिले की भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि गंगा नदी प्रणाली (Ganga River System) की एक महत्वपूर्ण और सक्रिय उपधारा है। रवई का कुआनों नदी में मिलना, कुआनों का घाघरा में समाहित होना और अंततः घाघरा का गंगा में विलय—यह क्रम निर्विवाद रूप से सिद्ध करता है कि रवई गंगा चैनल का अभिन्न हिस्सा है। इस तथ्य की उपेक्षा करना केवल एक नदी की अनदेखी नहीं, बल्कि गंगा संरक्षण की पूरी अवधारणा को कमजोर करना है।
रवई नदी का महत्व केवल जलविज्ञान या भूगोल तक सीमित नहीं है। यह नदी भारतीय लोकसंस्कृति और आस्था की एक जीवंत धारा रही है। जनश्रुतियों के अनुसार इसका जन्म श्रवण कुमार की करुण कथा से जुड़ा है। कहा जाता है कि श्रवण कुमार के नेत्रहीन माता–पिता शांतनु व ज्ञानवती के आँसुओं से निकली जलधारा आगे चलकर “रोई नदी” कहलाई, जो कालांतर में रवई बन गई। यही कारण है कि इस नदी को करुणा, सेवा और त्याग का प्रतीक माना गया। इसके दोनों किनारों पर समय माता के अनेक मंदिर, ग्रामीण आस्थाओं के केंद्र और लोकपरंपराओं के चिन्ह आज भी मौजूद हैं। रवई केवल जल नहीं, बल्कि स्मृति, संस्कृति और सामूहिक चेतना की वाहक रही है।
सदियों तक रवई नदी ने आसपास के गाँवों की प्यास बुझाई, खेतों को सींचा और पशुपालन व कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा दिया। किंतु वर्तमान समय में यह नदी गंभीर संकट से गुजर रही है। मौसमी प्रवाह, घटता जलस्तर, जलकुंभी का अत्यधिक प्रसार, मिट्टी खनन, नालों का प्रदूषित पानी और अवैज्ञानिक मानवीय हस्तक्षेप—इन सबने मिलकर रवई को लगभग एक संकटग्रस्त जलधारा में बदल दिया है। गर्मियों में कई स्थानों पर इसका प्रवाह रुक जाता है और केवल छोटे–छोटे जलकुंड शेष रह जाते हैं। यही वह समय होता है जब प्रदूषण का प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है और इसका सीधा असर पशुपालन, कृषि और जनस्वास्थ्य पर पड़ता है।
आधुनिक पर्यावरणीय विज्ञान और कानून यह स्पष्ट करते हैं कि किसी भी प्रमुख नदी की स्वच्छता उसकी सहायक और उप–सहायक नदियों के संरक्षण के बिना संभव नहीं है। इसी सिद्धांत के आधार पर “नमामि गंगे” जैसे कार्यक्रम पूरे गंगा बेसिन को एक इकाई के रूप में देखते हैं। इस दृष्टि से रवई नदी में होने वाला कोई भी प्रदूषण अप्रत्यक्ष रूप से गंगा को प्रदूषित करने के समान है। यदि रवई असुरक्षित है, तो कुआनों, घाघरा और अंततः गंगा भी सुरक्षित नहीं रह सकती। इसलिए रवई का संरक्षण स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय नदी संरक्षण नीति का अभिन्न हिस्सा है।
इसी पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) द्वारा ओ०ए० संख्या 613/2022, राम मिलन साहनी बनाम राज्य सरकार व अन्य में पारित आदेश अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। इस आदेश में एनजीटी ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि सड़कों, नदियों, जलमार्गों, नालों, आर्द्रभूमियों और उनके तटीय क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट का संग्रह, ढेर या अवैज्ञानिक निस्तारण प्रतिबंधित है। यह आदेश केवल किसी एक मामले या किसी एक जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे देश में लागू होने वाला एक पर्यावरणीय सिद्धांत है। एनजीटी के निर्णयों में बार–बार दो मूल सिद्धांत उभरकर आते हैं—सावधानी सिद्धांत (Precautionary Principle) और प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle)। इनका आशय यह है कि यदि किसी गतिविधि से पर्यावरणीय क्षति की आशंका है, तो पूर्ण वैज्ञानिक प्रमाण की प्रतीक्षा किए बिना भी उस गतिविधि को रोका जा सकता है, और यदि क्षति होती है तो उसका दायित्व प्रदूषक पर होगा।
इसी कानूनी पृष्ठभूमि में कोइलपुरा क्षेत्र में रवई नदी के तट पर स्थापित मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) केंद्र का प्रश्न उभरकर सामने आता है। लगभग 38 लाख रुपये की लागत से बने इस केंद्र का उद्देश्य नगर से निकलने वाले कचरे का वैज्ञानिक पृथक्करण, पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अलग करना और शेष कचरे का सुरक्षित निस्तारण सुनिश्चित करना था। सिद्धांत रूप में यह योजना स्वच्छता और संसाधन संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक कदम प्रतीत होती है। किंतु पर्यावरणीय कानूनों में किसी भी परियोजना की वैधता केवल उसके उद्देश्य से नहीं, बल्कि उसके स्थान, संरचना और प्रभाव से तय होती है। नदी तट पर स्थित कोई भी कचरा–संबंधी गतिविधि स्वभावतः उच्च जोखिम वाली मानी जाती है।
स्थानीय स्तर पर यह आरोप और अनुभव सामने आए हैं कि एमआरएफ केंद्र पर लंबे समय तक मशीनें बंद रहीं, कचरे का समुचित पृथक्करण नहीं हुआ और दूषित तरल व दुर्गंध आसपास के क्षेत्र में फैलती रही। यदि लीचेट या गंदा पानी बिना शोधन के सीधे नदी में पहुँचता है, तो यह ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016, जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और एनजीटी आदेशों—तीनों का उल्लंघन है। और जब यह उल्लंघन गंगा चैनल की उपधारा में हो, तो मामला स्थानीय प्रशासनिक चूक से आगे बढ़कर राष्ट्रीय नदी संरक्षण तंत्र की विफलता का रूप ले लेता है।
यहीं पर जिला गंगा समिति (District Ganga Committee – DGC) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के दिशा–निर्देशों के तहत गठित इस समिति के अध्यक्ष जिलाधिकारी होते हैं और इनका दायित्व गंगा तथा उसकी सहायक नदियों की स्वच्छता, प्रदूषण नियंत्रण, ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन की निगरानी तथा योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन का होता है। यदि रवई नदी गंगा चैनल का हिस्सा है—और भौगोलिक व हाइड्रोलॉजिकल रूप से वह है—तो रवई से जुड़ी प्रत्येक गतिविधि जिला गंगा समिति के प्रत्यक्ष दायरे में आती है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या समिति ने रवई नदी को औपचारिक रूप से गंगा बेसिन की उपधारा मानकर उसका संज्ञान लिया है, क्या एमआरएफ केंद्र के स्थान चयन और संचालन की पर्यावरणीय समीक्षा की गई है, और क्या रवई के जल गुणवत्ता आंकड़े गंगा निगरानी तंत्र में शामिल हैं। इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर न मिलना प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
रवई नदी का संकट केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। यह जनस्वास्थ्य, पशुपालन और ग्रामीण आजीविका से भी सीधे जुड़ा हुआ है। दूषित जल से पशुओं में रोग फैलते हैं, चारे और दूध की गुणवत्ता प्रभावित होती है और ग्रामीण क्षेत्रों में त्वचा तथा पेट संबंधी बीमारियाँ बढ़ती हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में रवई जैसी छोटी और मौसमी नदियाँ प्राकृतिक बफर का काम करती हैं। उनका सूखना या प्रदूषित होना भविष्य में बाढ़, जल संकट और पारिस्थितिक असंतुलन—तीनों की आशंका को बढ़ाता है। इसलिए रवई का संरक्षण केवल वर्तमान की आवश्यकता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा का प्रश्न है।
देश के अन्य हिस्सों में हिंडन, वरुणा और तमसा जैसी गंगा की सहायक नदियों के लिए विशेष कार्ययोजनाएँ बनीं और न्यायिक हस्तक्षेप हुआ। इसके विपरीत रवई जैसी उपधाराएँ प्रशासनिक प्राथमिकताओं से बाहर रहीं। यह स्थिति क्षेत्रीय असमानता और नीति–निर्माण की खामियों को उजागर करती है। यदि गंगा को वास्तव में स्वच्छ और अविरल बनाना है, तो उसकी हर उपधारा—चाहे वह छोटी हो या बड़ी—को समान गंभीरता से देखना होगा।
रवई नदी का संरक्षण किसी एक विभाग या संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। जिला गंगा समिति, नगर पालिका, उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, ग्राम पंचायतें, स्थानीय समुदाय और स्वयंसेवी संगठन—सभी की साझा भूमिका इसमें आवश्यक है। नदी तट का स्पष्ट सीमांकन, बफर ज़ोन का निर्धारण, एमआरएफ केंद्र सहित सभी तटीय गतिविधियों का स्वतंत्र पर्यावरणीय ऑडिट, शून्य–लीचेट नीति, सरयू नहर प्रणाली से स्थायी जल प्रवाह, निरंतर सफाई अभियान और जल गुणवत्ता आंकड़ों की पारदर्शी सार्वजनिक निगरानी—ये सभी कदम मिलकर ही रवई को पुनर्जीवित कर सकते हैं।
अंततः रवई नदी की उपेक्षा दरअसल गंगा के प्रति हमारी अधूरी समझ का प्रतीक है। राम मिलन साहनी प्रकरण ने कानूनी चेतावनी दे दी है। अब यह जिला गंगा समिति और प्रशासन पर निर्भर करता है कि वे इस चेतावनी को ठोस, विधिसम्मत और वैज्ञानिक कार्रवाई में बदलें। रवई का संरक्षण केवल एक स्थानीय पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि गंगा चैनल की जड़ों की रक्षा है। और जड़ों की रक्षा के बिना कोई भी नदी, कोई भी संस्कृति और कोई भी सभ्यता लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकती।
✍️ अखिल कुमार यादव













