उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद से होकर बहने वाली रवई नदी केवल एक भौगोलिक संरचना नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र के सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। श्रवण कुमार की करुण गाथा से जुड़ी इस नदी का उल्लेख लोककथाओं, जनश्रुतियों और धार्मिक स्मृतियों में मिलता है। सदियों तक यह नदी आसपास के गाँवों की प्यास बुझाती रही, खेतों को सींचती रही और पशुपालन व कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देती रही।
किंतु वर्तमान समय में रवई नदी प्रदूषण, अवैज्ञानिक मानवीय हस्तक्षेप और प्रशासनिक शिथिलता के कारण गंभीर संकट की स्थिति में दिखाई देती है। इसी संदर्भ में कोइलपुरा क्षेत्र में नदी तट पर स्थापित मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ) केंद्र और उससे जुड़ा साहनी प्रकरण एक महत्वपूर्ण कानूनी और पर्यावरणीय विमर्श को जन्म देता है। यह विमर्श केवल स्थानीय असंतोष या भावनात्मक प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका आधार स्पष्ट रूप से कानून और न्यायिक आदेश हैं। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी), नई दिल्ली द्वारा ओ०ए० संख्या 613/2022, राम मिलन साहनी बनाम स्टेट ऑफ यू०पी० व अन्य में पारित आदेश दिनांक–26 जुलाई, 2024 इस पूरे मामले में केंद्रीय महत्व रखता है।
इस आदेश में एनजीटी ने यह स्पष्ट निर्देश दिया है कि सड़क किनारे, नदियों, जलमार्गों, नालों, आर्द्रभूमि, पंचायत अथवा राज्य भूमि तथा विभिन्न प्राधिकरणों के स्वामित्व वाली भूमि पर ठोस अपशिष्ट (नगरीय कचरा) का संग्रह, ढेर या अवैज्ञानिक निस्तारण प्रतिबंधित है। यह निर्देश पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 की भावना के अनुरूप है और इसका उद्देश्य जलस्रोतों को प्रदूषण से बचाना है।

इसी कानूनी पृष्ठभूमि में रवई नदी के किनारे स्थित एमआरएफ केंद्र का प्रश्न उभरकर सामने आता है। यह केंद्र लगभग 38 लाख रुपये की लागत से इस उद्देश्य के साथ स्थापित किया गया था कि नगर से निकलने वाले कचरे का वैज्ञानिक पृथक्करण किया जाए, पुनर्चक्रण योग्य सामग्री को अलग किया जाए और शेष कचरे का सुरक्षित निस्तारण सुनिश्चित किया जाए। सिद्धांत रूप में यह योजना स्वच्छता, संसाधन संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में एक सकारात्मक कदम प्रतीत होती है। किंतु व्यावहारिक स्तर पर इसके क्रियान्वयन को लेकर समय-समय पर कई प्रश्न उठते रहे हैं।
प्रारंभिक अवधि में यह देखने में आया कि केंद्र पर मशीनों का संचालन नियमित नहीं था, कचरे का समुचित पृथक्करण नहीं हो पा रहा था और बड़ी मात्रा में कचरा खुले में जमा किया जा रहा था। कचरे से निकलने वाला दूषित तरल और दुर्गंध आसपास के क्षेत्र में फैलने की शिकायतें भी सामने आईं। स्थानीय नागरिकों ने यह अनुभव किया कि नदी के जल की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है और गर्मियों के महीनों में स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है, जब नदी का प्रवाह स्वाभाविक रूप से कम हो जाता है।

हाल के समय में यह जानकारी सामने आई है कि एमआरएफ केंद्र का संचालन आरंभ कर दिया गया है। प्रशासनिक दृष्टि से इसे एक सुधारात्मक कदम माना जा सकता है, क्योंकि कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन पर्यावरण संरक्षण की दिशा में आवश्यक है। किंतु साहनी प्रकरण के आलोक में यह प्रश्न अब भी बना हुआ है कि यदि यह केंद्र नदी के निर्धारित बफर ज़ोन या संवेदनशील क्षेत्र के भीतर स्थित है, तो क्या उसका संचालन विधिसम्मत कहा जा सकता है? कानून की दृष्टि में किसी गतिविधि की वैधता केवल उसके उद्देश्य या तकनीकी स्वरूप से तय नहीं होती, बल्कि उसके स्थान और पर्यावरणीय प्रभाव भी उतने ही निर्णायक होते हैं।
पर्यावरणीय कानूनों में नदियों और जलस्रोतों को विशेष संरक्षण प्रदान किया गया है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 स्पष्ट करते हैं कि कचरे का ऐसा कोई भी प्रबंधन नहीं किया जाना चाहिए, जिससे जलस्रोतों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रदूषण पहुँचे। इसी प्रकार जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 का उद्देश्य नदियों और जलाशयों को प्रदूषण से बचाना है। इन कानूनों की मूल भावना यही है कि कचरे से उत्पन्न लीचेट, रासायनिक अवशेष, दुर्गंध और जैविक अपशिष्ट किसी भी स्थिति में जलधारा में प्रवेश न करें।
साहनी प्रकरण ने इस सिद्धांत को और स्पष्ट किया है कि स्थानगत प्रतिबंध पर्यावरण कानूनों का एक महत्वपूर्ण आधार है। यदि कोई गतिविधि नदी के किनारे या उसके निकट की जा रही है, तो वह स्वतः उच्च जोखिम वाली मानी जाती है और उसके लिए अतिरिक्त सतर्कता तथा कड़े मानकों की आवश्यकता होती है। इस दृष्टि से देखा जाए तो केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि एमआरएफ केंद्र का संचालन शुरू हो गया है; यह भी देखना आवश्यक है कि उसका स्थान, संरचना और संचालन एनजीटी के आदेशों और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप है या नहीं।
एनजीटी आदेश में उल्लंघन की स्थिति में दंड का भी स्पष्ट प्रावधान किया गया है। किसी व्यक्ति द्वारा नदी या अन्य प्रतिबंधित स्थानों पर कूड़ा फेंकने या जमा करने पर प्रथम उल्लंघन में 5000 रुपये और पुनरावृत्ति पर 10,000 रुपये का पर्यावरणीय जुर्माना लगाया जा सकता है। वहीं होटल, रेस्टोरेंट, मैरिज हॉल, गेस्ट हाउस, संस्थान जैसे बल्क वेस्ट जनरेटर के लिए यह जुर्माना 25,000 से 50,000 रुपये तक निर्धारित है। यह जुर्माना स्थानीय निकाय या प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जांच के उपरांत अधिरोपित किया जाता है और भुगतान न करने की स्थिति में भू-राजस्व की भांति वसूली का प्रावधान है। इन प्रावधानों का उद्देश्य दंड देना भर नहीं, बल्कि नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित करना है।
रवई नदी की स्थिति को यदि व्यापक संदर्भ में देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि वह पहले ही कई पर्यावरणीय दबावों से गुजर रही है। मौसमी प्रवाह, जलकुंभी का प्रसार, मिट्टी खनन और घटता जलस्तर—ये सभी कारक नदी की सहनशीलता को कमजोर करते हैं। ऐसे में नदी किनारे किसी भी प्रकार की कचरा-संबंधी गतिविधि उसके लिए अतिरिक्त जोखिम उत्पन्न करती है। स्थानीय स्तर पर यह अनुभव किया गया है कि गर्मियों में जब जलस्तर घट जाता है, तब प्रदूषण का प्रभाव अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देता है और इसका असर पशुपालन, कृषि और जनस्वास्थ्य पर पड़ता है।
साहनी प्रकरण का महत्व केवल कानूनी निर्देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही के प्रश्न को भी रेखांकित करता है। यदि एमआरएफ केंद्र नगर पालिका या किसी अन्य स्थानीय निकाय के अधीन संचालित है, तो उसके स्थान चयन और पर्यावरणीय अनुपालन की जिम्मेदारी भी उसी की बनती है। यदि संचालन किसी एजेंसी को सौंपा गया है, तो निगरानी करने वाले अधिकारियों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है। कानून यह अपेक्षा करता है कि ऐसी परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय स्वीकृतियाँ, स्थान निर्धारण और नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि पर्यावरणीय मामलों में अंतिम निष्कर्ष किसी लेख या टिप्पणी से नहीं, बल्कि सक्षम प्राधिकारी द्वारा की गई भौतिक जांच, अभिलेखों के परीक्षण और विधिसम्मत निर्णय से ही निकलता है। इसलिए एमआरएफ केंद्र के संबंध में भी यही प्रक्रिया अपेक्षित है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि उसका वर्तमान स्थान और संचालन एनजीटी के आदेशों और लागू नियमों के अनुरूप है या नहीं।

अंततः राम मिलन साहनी प्रकरण और रवई नदी का यह पूरा प्रसंग हमें यह स्मरण कराता है कि स्वच्छता, विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बशर्ते वे कानून और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुरूप हों। यदि स्वच्छता के नाम पर नदी के किनारे कचरा-संबंधी गतिविधियाँ संचालित की जाती हैं और वे विधिक सीमाओं का उल्लंघन करती हैं, तो वे जनहित के उद्देश्य को ही कमजोर कर देती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और स्थानीय निकाय मिलकर तथ्यों की निष्पक्ष जांच करें और यह सुनिश्चित करें कि रवई नदी के तट पर होने वाली हर गतिविधि कानून की स्पष्ट सीमा के भीतर हो।
रवई नदी का संरक्षण केवल पर्यावरणीय दायित्व नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। साहनी प्रकरण ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नदी के किनारे कचरा डालना, जमा करना या उससे जुड़ी गतिविधियाँ करना एक संवेदनशील और कानूनी रूप से नियंत्रित विषय है। अब यह संबंधित संस्थाओं पर निर्भर करता है कि वे इस कानूनी चेतावनी को गंभीरता से लेकर रवई नदी के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में ठोस और विधिसम्मत कदम उठाएँ।
✍️ अखिल कुमार यादव












