बीस साल पहले, जब भारत ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) लागू किया, तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि यह योजना ग्रामीण भारत की रोज़गार सुरक्षा, सामाजिक न्याय और महिला सशक्तिकरण की रीढ़ बन जाएगी। बाद में इसे महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) के नाम से जाना जाने लगा। मनरेगा ने करोड़ों परिवारों को भूख और गरीबी से बचाया, पंचायत स्तर पर न्यूनतम मजदूरी तय की, महिलाओं को घर के बाहर काम दिया और सबसे महत्वपूर्ण — काम मांगने पर उसे कानूनी अधिकार का दर्जा दिया। यह दया या कृपा नहीं थी, बल्कि ग्रामीण के लिए एक सत्यापन योग्य अधिकार था। लेकिन दिसंबर, 2025 में संसद के शीतकालीन सत्र में पेश हुआ विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) बिल, जिसे संक्षेप में VB‑G RAM G कहा जा रहा है, इस बीस साल पुराने अधिकार-आधारित ढांचे को पूरी तरह बदलने जा रहा है। सरकार इसे “अपग्रेड” बता रही है, जबकि विपक्ष इसे “आर्थिक अधिकार का अंत” मान रहा है। इस बदलाव को समझना सिर्फ़ कानूनी पक्ष तक सीमित नहीं है; यह ग्रामीण जीवन, सामाजिक सुरक्षा और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा असर डाल सकता है।
VB‑G RAM G में कई बड़े वादे किए गए हैं: 100 दिन की जगह 125 दिन का गारंटीड रोजगार, डिजिटल अटेंडेंस और तेज़ भुगतान (साप्ताहिक या पंद्रह दिन में), और चार निर्धारित क्षेत्रों में काम — जल सुरक्षा, ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर, आजीविका और जलवायु लचीलापन। सुनने में यह सब आकर्षक लगता है, जैसे पुरानी गाड़ी में नया इंजन और नया स्टीरियो लगाना। लेकिन असल में गाड़ी की मूल संरचना ही बदल दी गई है, और यह नया इंजन केवल तभी चलेगा जब ऊपर से तेल डाला जाएगा।
मनरेगा की सबसे बड़ी ताकत थी इसका मांग-आधारित (डिमांड-ड्रिवन) स्वरूप। कोई भी ग्रामीण व्यक्ति पंचायत में आवेदन करता था और पंद्रह दिन के भीतर काम मिलना अनिवार्य था। काम न मिलने पर बेरोज़गारी भत्ता मिलता था। यह दया नहीं, कानूनी अधिकार था। अब योजना सप्लाई-ड्रिवन होगी। राज्य हर साल एक वर्क प्लान बनाएगा, केंद्र उसे मंजूरी देगा, बजट तय होगा और उतने ही दिन का काम मिलेगा। अगर मांग बढ़ी, तो क्या होगा? कुछ नहीं। मनरेगा की फंडिंग का ढांचा भी बदल गया है। पहले, मजदूरी का 100% और सामग्री का 75% खर्च केंद्र उठाता था। अब VB‑G RAM G में सामान्य राज्यों में 60:40 और पूर्वोत्तर/हिमालयी राज्यों में 90:10 का अनुपात होगा। इसका असर सबसे अधिक उन राज्यों पर पड़ेगा जहां मनरेगा का सबसे ज़्यादा उपयोग होता है और राजस्व घाटा भी बड़ा है, जैसे बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और ओडिशा। राज्य या तो अपनी अन्य योजनाओं से धन काटेंगे या नया अवतार सिकुड़ जाएगा। दोनों ही मामलों में ग्रामीण गरीब हानि में रहेगा। आंध्र प्रदेश के वित्त मंत्री ने इसे राज्य के लिए असहनीय बोझ बताया।
इसका मतलब है कि केंद्र अपने ही सहयोगियों को मजबूर कर रहा है कि वे गरीबों की मजदूरी अपने खजाने से दें।
एक और महत्वपूर्ण बदलाव है मौसमी विराम। कृषि के व्यस्त मौसम में 60 दिन का अनिवार्य ब्रेक रखा गया है। सरकार का तर्क है कि इससे खेतों में मजदूर उपलब्ध होंगे। लेकिन मनरेगा कभी कृषि का विकल्प नहीं था, बल्कि उसकी पूरक योजना थी। जब फसल खराब हो जाती है, जब बारिश नहीं होती, जब खेतों में काम नहीं बचता — तब मनरेगा ही मजदूर का सुरक्षा कवच होता है। अब 60 दिन का लॉकडाउन उसी समय लागू होगा जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत होगी। यह ग्रामीण मज़दूर को मौसम का गुलाम बनाने जैसा है।
नाम और प्रतीकात्मक बदलाव भी ध्यान देने योग्य हैं। अब “महात्मा गांधी” नाम इस योजना से हट गया है। गांधी का नाम सिर्फ़ प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीण स्वावलंबन, ग्राम स्वराज और अंतिम व्यक्ति तक विकास की विचारधारा का प्रतीक था। “विकसित भारत” सुनने में आकर्षक है, लेकिन इसमें वह नैतिक बल और अधिकार की भावना नहीं। विरोधियों का कहना है कि नए साइनबोर्ड, नए लोगो और नई वेबसाइट बनाने में अरबों रुपए खर्च हो जाएंगे, जबकि यह पैसा सीधे मजदूर की जेब में जा सकता था।
डिजिटल इंडिया का जुमला भी इस योजना में खोखला साबित हो रहा है। डिजिटल अटेंडेंस, आधार-लिंक्ड पेमेंट और ऐप आधारित काम का चुनाव सुनने में शानदार लगता है। लेकिन ग्रामीण भारत में 30% से अधिक पंचायतों में इंटरनेट नहीं है, मोबाइल नेटवर्क अस्थिर है और बिजली चौबीस घंटे में अक्सर कुछ घंटे ही उपलब्ध होती है। यदि बायोमेट्रिक फेल हो गया तो मजदूर की मेहनत बेकार होगी। तकनीक को मज़बूत बनाने की बजाय, मज़दूर अब तकनीक का गुलाम बन गया है।
मनरेगा को सुधारने की बजाय पूरी योजना बदल दी गई है। देरी से भुगतान, भ्रष्टाचार और फर्जी मस्टर रोल जैसी समस्याएँ थीं। इन्हें सुधारकर योजना को मज़बूत बनाया जा सकता था। सोशल ऑडिट को मज़बूत करके, पेमेंट सिस्टम को दुरुस्त करके और सामग्री खर्च पर कड़ाई करके ही मनरेगा को और बेहतर बनाया जा सकता था। इसके बजाय पुरानी योजना को झटके में बदल दिया गया। यह वही तरीका है जो नोटबंदी के समय अपनाया गया था: पुरानी व्यवस्था को एक झटके में खत्म करो, नई योजना लाओ, और वर्षों तक सुधार करते रहो। नुकसान जनता का, क्रेडिट सरकार का।
VB‑G RAM G के लागू होने से ग्रामीण मजदूर और उनके परिवारों पर वास्तविक असर पड़ेगा। झारखंड के एक छोटे गाँव में एक महिला श्रमिक अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए मनरेगा पर निर्भर थी। यदि VB‑G RAM G लागू हो गया और बजट खत्म हो गया, तो उसका परिवार आर्थिक असुरक्षा का सामना करेगा। ऐसे उदाहरण देश भर में हजारों हैं।
अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में भी VB‑G RAM G का मॉडल जोखिमपूर्ण प्रतीत होता है। दुनिया के अन्य देशों जैसे बांग्लादेश में ग्रामीण रोजगार गारंटी मांग-आधारित और समुदाय-निर्देशित है। ब्राज़ील में “Bolsa Família” ने गरीबी और बेरोज़गारी पर स्थायी प्रभाव डाला। VB‑G RAM G मॉडल इन योजनाओं की तुलना में अधिक केंद्र-नियंत्रित और बजट-निर्धारित है।
राजनीतिक और सामाजिक पहलू भी महत्वपूर्ण हैं। गांधी का नाम हटना केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है। विपक्ष और विशेषज्ञों का कहना है
कि यह ग्रामीण अधिकारों और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति असंवेदनशीलता दर्शाता है। सरकार का तर्क है कि पुरानी योजना को आधुनिक समय के अनुसार ढालना ज़रूरी था।
भविष्य में ग्रामीण आजीविका पर कई दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकते हैं। मजदूर अब मांग पर काम नहीं पाएंगे, केवल बजट उपलब्धता पर निर्भर रहेंगे। स्थिर आय और सुरक्षा कम होगी। डिजिटल निगरानी बढ़ेगी, लेकिन तकनीक की कमजोरियों के कारण जोखिम भी बढ़ेगा। सुझाव है कि राज्य और केंद्र मिलकर बजट लचीलापन दें ताकि आपात स्थितियों में काम सुनिश्चित हो, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत किया जाए, मौसमी विराम में लचीलापन रखा जाए और सोशल ऑडिट तथा पारदर्शिता बढ़ाई जाए।
VB‑G RAM G बिल अब कानून बन चुका है। इसे मनरेगा का “अपग्रेड” बताया जा रहा है, लेकिन वास्तव में यह डिमांड-आधारित अधिकार-आधारित मॉडल को हटाकर बजट-नियंत्रित और विकास-केंद्रित योजना में बदलता है। ग्रामीण भारत अब स्थिर आय और सुरक्षा के लिए केंद्र और राज्य के बजट पर निर्भर रहेगा। कुछ नई सड़कें, तालाब और इन्फ्रास्ट्रक्चर बन सकते हैं, लेकिन बीस साल से चले आ रहे मनरेगा वाले सुरक्षा कवच की कमी महसूस होगी।
यदि यह बिल पूरी तरह लागू हो गया, तो 2026 से गाँवों में एक नया शब्द अक्सर सुनाई देगा:
“इस साल बजट ख़त्म हो गया।”
और उस दिन ग्रामीण भारत समझ जाएगा कि “विकसित भारत” का नारा शहरों के लिए था, गाँवों के लिए सिर्फ़ नाम बदल दिया गया।
✍️ अखिल कुमार यादव












