मानव सभ्यता के आरंभ से ही समय की गणना केवल दिनों और महीनों को गिनने की तकनीक नहीं रही। समय हमेशा से समाज की सामूहिक स्मृति, धार्मिक विश्वास और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा रहा है। भारत में विक्रम संवत् और शक संवत् केवल कैलेंडर नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि रहे हैं। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाला हिंदू नववर्ष प्रकृति के पुनर्जागरण, फसल चक्र और ऋतु परिवर्तन से जुड़ा है। इसी तरह इस्लामी दुनिया में हिजरी संवत् है, जिसका आधार पैग़ंबर मुहम्मद की मक्का से मदीना हिजरत की ऐतिहासिक घटना है। यह कैलेंडर चंद्रमा की गति पर आधारित है और इसका नया साल मुहर्रम से आरंभ होता है।
दुनिया के अन्य हिस्सों में भी समय की अपनी-अपनी अवधारणाएँ रही हैं। चीन का पारंपरिक चंद्र नववर्ष, ईरान का नौरोज़, यहूदी कैलेंडर का रोश हशाना—ये सभी नए साल केवल तारीख़ बदलने के अवसर नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक स्मृति के उत्सव रहे हैं। इन सभी परंपराओं में समय स्थानीय भूगोल, जलवायु, खगोल और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ा रहा है।
जिस कैलेंडर को आज हम अंग्रेज़ी या ग्रेगोरियन कैलेंडर कहते हैं, उसका उद्भव यूरोप में हुआ। सोलहवीं शताब्दी में पोप ग्रेगरी तेरहवें द्वारा इसे ईसाई धार्मिक तिथियों में सुधार के उद्देश्य से लागू किया गया था। इसका उद्देश्य ईस्टर जैसे त्योहारों को खगोलीय गणनाओं के अधिक निकट लाना था। आरंभ में यह एक धार्मिक-सुधार परियोजना थी, लेकिन आने वाले समय में यह यूरोपीय सत्ता का एक प्रभावशाली उपकरण बन गई।
सत्रहवीं से बीसवीं शताब्दी के बीच यूरोपीय शक्तियों—विशेषकर ब्रिटेन—ने एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के विशाल भूभाग पर औपनिवेशिक शासन स्थापित किया। शासन केवल सेना या प्रशासन से नहीं चलता, बल्कि नियम, दस्तावेज़, तारीख़ और समय से भी चलता है। अदालतों की तारीख़ें, कर वसूली की समय-सीमा, सरकारी आदेश, शिक्षा प्रणाली और व्यापार—हर जगह यूरोपीय कैलेंडर को अनिवार्य बना दिया गया। धीरे-धीरे यह कैलेंडर आधुनिकता और ‘व्यवस्था’ का पर्याय बन गया, जबकि स्थानीय कैलेंडर परंपरा या आस्था तक सीमित कर दिए गए।
इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप 1 जनवरी को नया साल मानने की परंपरा वैश्विक बनती चली गई। भारत जैसे देशों में, जहाँ अपनी समय-परंपराएँ अत्यंत समृद्ध थीं, वहाँ भी औपनिवेशिक शासन के साथ अंग्रेज़ी कैलेंडर प्रशासनिक जीवन का आधार बन गया। स्वतंत्रता के बाद भी यह ढाँचा लगभग ज्यों का त्यों बना रहा। एक रोचक लेकिन गंभीर तथ्य यह है कि भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय कैलेंडर आज भी शक संवत् है, फिर भी सरकारी योजनाएँ, बजट, परीक्षा सत्र, वित्तीय वर्ष और नीतिगत घोषणाएँ पूरी तरह ग्रेगोरियन कैलेंडर से संचालित होती हैं। यह विरोधाभास बताता है कि सांस्कृतिक पहचान और व्यवहारिक शासन-व्यवस्था के बीच कितनी गहरी दूरी बन चुकी है।
आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था ने इस दूरी को और बढ़ाया। शेयर बाज़ार, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली, आईएमएफ और विश्व बैंक जैसी संस्थाएँ—सबका समय एक ही कैलेंडर से बँधा है। वित्तीय वर्ष, तिमाही नतीजे, ब्याज दरें और वैश्विक आर्थिक सूचकांक ग्रेगोरियन कैलेंडर पर ही आधारित हैं। जिस दिन वैश्विक बाज़ार खुलते और बंद होते हैं, वही दिन दुनिया के लिए महत्वपूर्ण बन जाते हैं। इस तरह जनवरी केवल एक महीना नहीं, बल्कि पूँजीवादी समय-चक्र का प्रतीक बन जाता है।
मीडिया और उपभोक्ता संस्कृति ने 1 जनवरी को एक वैश्विक उत्सव में बदल दिया है। 31 दिसंबर की रात काउंटडाउन, चमकदार कार्यक्रम, पार्टी संस्कृति, पर्यटन उद्योग और विज्ञापन—इन सबने मिलकर नए साल को एक भव्य उपभोक्ता आयोजन बना दिया है। इसके उलट चैत्र नववर्ष या हिजरी नववर्ष सादगी, धार्मिक अनुष्ठान और सीमित सामाजिक दायरे तक सिमटते चले गए। नया साल अब आत्ममंथन या सामूहिक स्मृति का अवसर नहीं, बल्कि उपभोग और प्रदर्शन का पर्व बन गया है।
इस पूरे संदर्भ में चीन का उदाहरण विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। चीन न तो अंग्रेज़ी को अपनी आधिकारिक भाषा मानता है, न गूगल जैसी पश्चिमी तकनीकी कंपनियों को पूरी तरह स्वीकार करता है और न ही पश्चिमी राजनीतिक ढाँचों को जस का तस अपनाता है। इसके बावजूद चीन अपने सरकारी और अंतरराष्ट्रीय कामकाज में ग्रेगोरियन कैलेंडर का ही उपयोग करता है और 1 जनवरी को नया साल मानता है। हालाँकि उसका पारंपरिक चीनी नववर्ष आज भी पूरे सांस्कृतिक वैभव के साथ मनाया जाता है, लेकिन वैश्विक व्यवस्था से जुड़े रहने के लिए उसने अंग्रेज़ी कैलेंडर को व्यवहारिक रूप से स्वीकार किया है। यह दिखाता है कि भाषा और तकनीक को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन वैश्विक समय-व्यवस्था से बाहर रहना लगभग असंभव है।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि जनवरी को नया साल मानना केवल मानसिक गुलामी का प्रश्न नहीं है। वैश्विक संवाद, व्यापार, कूटनीति और विज्ञान के लिए एक साझा समय-रेखा की आवश्यकता होती है। समस्या तब पैदा होती है, जब यह साझा व्यवस्था स्थानीय संस्कृतियों को गौण बना देती है और धीरे-धीरे उनकी सार्वजनिक उपस्थिति समाप्त होने लगती है।
आज विक्रम संवत्, शक संवत् और हिजरी संवत् जीवित तो हैं, लेकिन मुख्यधारा के सार्वजनिक जीवन से बाहर होते जा रहे हैं। वे त्योहारों, धार्मिक अनुष्ठानों और कैलेंडर के कोनों तक सीमित होते जा रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि 1 जनवरी को नया साल मनाया जाए या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या हम समय को देखने की अपनी विविध परंपराओं को बचा पाएँगे। क्या आने वाली पीढ़ियाँ भारतीय और अन्य पारंपरिक कैलेंडरों को केवल इतिहास की वस्तु के रूप में जानेंगी, या आधुनिक वैश्विक व्यवस्था के भीतर रहते हुए भी समय को देखने का कोई बहुविध और संतुलित दृष्टिकोण विकसित किया जा सकेगा—यही इस पूरी बहस का केंद्रीय प्रश्न है।
✍️ अखिल कुमार यादव
पिछले लगभग चार सौ वर्षों में दुनिया ने समय को देखने, समझने और जीने का अपना नज़रिया बुनियादी रूप से बदल लिया है। आज जैसे ही ‘नया साल’ शब्द बोला जाता है, तो लगभग पूरी दुनिया के मन में एक ही तारीख़ उभरती है—1 जनवरी। यह स्थिति इतनी स्वाभाविक और सर्वमान्य हो चुकी है कि अब इस पर सवाल उठाना ही अटपटा लगने लगता है। लेकिन इतिहास की परतें खोलने पर स्पष्ट होता है कि 1 जनवरी का नया साल बन जाना किसी प्राकृतिक नियम, खगोलीय अनिवार्यता या सार्वभौमिक सांस्कृतिक सहमति का परिणाम नहीं है। यह आधुनिक इतिहास, औपनिवेशिक सत्ता, वैश्विक अर्थव्यवस्था और आधुनिक राष्ट्र-राज्य व्यवस्था के विकास की संयुक्त देन है।
मानव सभ्यता के आरंभ से ही समय की गणना केवल दिनों और महीनों को गिनने की तकनीक नहीं रही। समय हमेशा से समाज की सामूहिक स्मृति, धार्मिक विश्वास और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा रहा है। भारत में विक्रम संवत् और शक संवत् केवल कैलेंडर नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि रहे हैं। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होने वाला हिंदू नववर्ष प्रकृति के पुनर्जागरण, फसल चक्र और ऋतु परिवर्तन से जुड़ा है। इसी तरह इस्लामी दुनिया में हिजरी संवत् है, जिसका आधार पैग़ंबर मुहम्मद की मक्का से मदीना हिजरत की ऐतिहासिक घटना है। यह कैलेंडर चंद्रमा की गति पर आधारित है और इसका नया साल मुहर्रम से आरंभ होता है।
दुनिया के अन्य हिस्सों में भी समय की अपनी-अपनी अवधारणाएँ रही हैं। चीन का पारंपरिक चंद्र नववर्ष, ईरान का नौरोज़, यहूदी कैलेंडर का रोश हशाना—ये सभी नए साल केवल तारीख़ बदलने के अवसर नहीं, बल्कि सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक स्मृति के उत्सव रहे हैं। इन सभी परंपराओं में समय स्थानीय भूगोल, जलवायु, खगोल और सामाजिक जीवन से गहराई से जुड़ा रहा है।
जिस कैलेंडर को आज हम अंग्रेज़ी या ग्रेगोरियन कैलेंडर कहते हैं, उसका उद्भव यूरोप में हुआ। सोलहवीं शताब्दी में पोप ग्रेगरी तेरहवें द्वारा इसे ईसाई धार्मिक तिथियों में सुधार के उद्देश्य से लागू किया गया था। इसका उद्देश्य ईस्टर जैसे त्योहारों को खगोलीय गणनाओं के अधिक निकट लाना था। आरंभ में यह एक धार्मिक-सुधार परियोजना थी, लेकिन आने वाले समय में यह यूरोपीय सत्ता का एक प्रभावशाली उपकरण बन गई।
सत्रहवीं से बीसवीं शताब्दी के बीच यूरोपीय शक्तियों—विशेषकर ब्रिटेन—ने एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के विशाल भूभाग पर औपनिवेशिक शासन स्थापित किया। शासन केवल सेना या प्रशासन से नहीं चलता, बल्कि नियम, दस्तावेज़, तारीख़ और समय से भी चलता है। अदालतों की तारीख़ें, कर वसूली की समय-सीमा, सरकारी आदेश, शिक्षा प्रणाली और व्यापार—हर जगह यूरोपीय कैलेंडर को अनिवार्य बना दिया गया। धीरे-धीरे यह कैलेंडर आधुनिकता और ‘व्यवस्था’ का पर्याय बन गया, जबकि स्थानीय कैलेंडर परंपरा या आस्था तक सीमित कर दिए गए।
इसी ऐतिहासिक प्रक्रिया के परिणामस्वरूप 1 जनवरी को नया साल मानने की परंपरा वैश्विक बनती चली गई। भारत जैसे देशों में, जहाँ अपनी समय-परंपराएँ अत्यंत समृद्ध थीं, वहाँ भी औपनिवेशिक शासन के साथ अंग्रेज़ी कैलेंडर प्रशासनिक जीवन का आधार बन गया। स्वतंत्रता के बाद भी यह ढाँचा लगभग ज्यों का त्यों बना रहा। एक रोचक लेकिन गंभीर तथ्य यह है कि भारत का आधिकारिक राष्ट्रीय कैलेंडर आज भी शक संवत् है, फिर भी सरकारी योजनाएँ, बजट, परीक्षा सत्र, वित्तीय वर्ष और नीतिगत घोषणाएँ पूरी तरह ग्रेगोरियन कैलेंडर से संचालित होती हैं। यह विरोधाभास बताता है कि सांस्कृतिक पहचान और व्यवहारिक शासन-व्यवस्था के बीच कितनी गहरी दूरी बन चुकी है।
आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था ने इस दूरी को और बढ़ाया। शेयर बाज़ार, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग प्रणाली, आईएमएफ और विश्व बैंक जैसी संस्थाएँ—सबका समय एक ही कैलेंडर से बँधा है। वित्तीय वर्ष, तिमाही नतीजे, ब्याज दरें और वैश्विक आर्थिक सूचकांक ग्रेगोरियन कैलेंडर पर ही आधारित हैं। जिस दिन वैश्विक बाज़ार खुलते और बंद होते हैं, वही दिन दुनिया के लिए महत्वपूर्ण बन जाते हैं। इस तरह जनवरी केवल एक महीना नहीं, बल्कि पूँजीवादी समय-चक्र का प्रतीक बन जाता है।
मीडिया और उपभोक्ता संस्कृति ने 1 जनवरी को एक वैश्विक उत्सव में बदल दिया है। 31 दिसंबर की रात काउंटडाउन, चमकदार कार्यक्रम, पार्टी संस्कृति, पर्यटन उद्योग और विज्ञापन—इन सबने मिलकर नए साल को एक भव्य उपभोक्ता आयोजन बना दिया है। इसके उलट चैत्र नववर्ष या हिजरी नववर्ष सादगी, धार्मिक अनुष्ठान और सीमित सामाजिक दायरे तक सिमटते चले गए। नया साल अब आत्ममंथन या सामूहिक स्मृति का अवसर नहीं, बल्कि उपभोग और प्रदर्शन का पर्व बन गया है।
इस पूरे संदर्भ में चीन का उदाहरण विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। चीन न तो अंग्रेज़ी को अपनी आधिकारिक भाषा मानता है, न गूगल जैसी पश्चिमी तकनीकी कंपनियों को पूरी तरह स्वीकार करता है और न ही पश्चिमी राजनीतिक ढाँचों को जस का तस अपनाता है। इसके बावजूद चीन अपने सरकारी और अंतरराष्ट्रीय कामकाज में ग्रेगोरियन कैलेंडर का ही उपयोग करता है और 1 जनवरी को नया साल मानता है। हालाँकि उसका पारंपरिक चीनी नववर्ष आज भी पूरे सांस्कृतिक वैभव के साथ मनाया जाता है, लेकिन वैश्विक व्यवस्था से जुड़े रहने के लिए उसने अंग्रेज़ी कैलेंडर को व्यवहारिक रूप से स्वीकार किया है। यह दिखाता है कि भाषा और तकनीक को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन वैश्विक समय-व्यवस्था से बाहर रहना लगभग असंभव है।
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि जनवरी को नया साल मानना केवल मानसिक गुलामी का प्रश्न नहीं है। वैश्विक संवाद, व्यापार, कूटनीति और विज्ञान के लिए एक साझा समय-रेखा की आवश्यकता होती है। समस्या तब पैदा होती है, जब यह साझा व्यवस्था स्थानीय संस्कृतियों को गौण बना देती है और धीरे-धीरे उनकी सार्वजनिक उपस्थिति समाप्त होने लगती है।
आज विक्रम संवत्, शक संवत् और हिजरी संवत् जीवित तो हैं, लेकिन मुख्यधारा के सार्वजनिक जीवन से बाहर होते जा रहे हैं। वे त्योहारों, धार्मिक अनुष्ठानों और कैलेंडर के कोनों तक सीमित होते जा रहे हैं। सवाल यह नहीं है कि 1 जनवरी को नया साल मनाया जाए या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या हम समय को देखने की अपनी विविध परंपराओं को बचा पाएँगे। क्या आने वाली पीढ़ियाँ भारतीय और अन्य पारंपरिक कैलेंडरों को केवल इतिहास की वस्तु के रूप में जानेंगी, या आधुनिक वैश्विक व्यवस्था के भीतर रहते हुए भी समय को देखने का कोई बहुविध और संतुलित दृष्टिकोण विकसित किया जा सकेगा—यही इस पूरी बहस का केंद्रीय प्रश्न है।
✍️ अखिल कुमार यादव













