कभी-कभी लगता है कि ज़िंदगी बस गुजर रही है,
ख्वाब कहीं पीछे छूट गए हैं, और ख्वाहिशें…
वो तो जैसे किसी पुराने संदूक में बंद कर दी गई हों,
धूल में लिपटी हुई, बेआवाज़ सी।
बचपन में जब आसमान को देखकर सपने बुने थे,
तो लगता था कि पंख होंगे तो उड़ ही जाएंगे।
पर अब… पंख तो हैं,
बस वक़्त की ज़ंजीरें इतनी भारी हो गई हैं कि उड़ान अधूरी रह जाती है।
कभी कुछ बनने की तमन्ना थी,
कभी कुछ पाने की जिद थी,
आज बस सबकुछ ‘ठीक’ चल रहा है —
न खुशी पूरी, न ग़म खुलकर।
ख्वाहिशें अब जिम्मेदारियों में घुल चुकी हैं,
माँ की दवा, बच्चों की फीस,
किराए की रसीद और अगले महीने की EMI —
अब यही ‘लक्ष्य’ हैं हमारे ख्वाबों के।
कभी किसी शांत रात में अकेले बैठो,
तो अंदर से एक आवाज़ आती है —
“क्या यही वो ज़िंदगी है जो तुझे जीनी थी?”
और आँखें… बेआवाज़ ही भीग जाती हैं।
हम मुस्कुराते हैं दुनिया के सामने,
क्योंकि आंसुओं को हमने ‘कमज़ोरी’ का नाम दे दिया है।
पर सच तो ये है कि हर मुस्कान के पीछे
एक न पूरा हुआ सपना छुपा है,
एक वो ख्वाहिश जो कभी दिल से निकली ही नहीं।
ख्वाब टूटते हैं, ख्वाहिशें दम तोड़ती हैं,
पर ज़िंदगी… वो तो चलती ही रहती है।
कभी किसी के लिए, कभी सबके लिए —
बस खुद के लिए कम चलती है।
अगर आप ये पढ़ रहे हो,
तो एक बार उन ख्वाबों को याद करो
जो कभी तुम्हारी आंखों की सबसे खूबसूरत चमक थे।
शायद आज भी वक़्त है —
थोड़ा सा खुद के लिए जी लो,
थोड़ी सी वो उड़ान फिर से भर लो।
क्योंकि ज़िंदगी दोबारा नहीं मिलेगी,
पर ख्वाब… वो फिर से देखे जा सकते हैं।
अगर दिल भीग गया हो, तो समझना… तुम अकेले नहीं हो।












