महर्षि स्वामी दयानंद – विज्ञान की प्रगति का स्वागत करनेवाले संन्यासी

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– स्वामी (डॉ) सत्यप्रकाश सरस्वती

स्वामी दयानंद समाज से अंधविश्वास को मिटाना चाहते थे — और यह केवल हिन्दू समाज तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने ईसाइयों [एवं मुसलमानों, , बौद्धों, जैनों आदि सभी मतावलंबियों] से भी अपील की कि वे अपने कई विश्वासों को सत्य के प्रकाश में सुधारें। दयानंद की शिक्षाएं सम्पूर्ण मानवता के लिए थीं। वे सबका भला चाहते थे और एक महान् संन्यासी की तरह सभी के कल्याण के लिए समर्पित थे।

उन्हें यूरोपीयों के उन गुणों की प्रशंसा की थी, जिनमें वे विज्ञान के अध्ययन में लगे हुए थे, अपने देशों में मेहनत से काम कर रहे थे, स्त्रियों और सभी वर्गों के लोगों को शिक्षा के अवसर दे रहे थे, और बहुविवाह को नहीं मानते थे। स्वामी दयानंद ने कई स्थानों पर अपनी रचनाओं में यूरोपीयों की इन विशेषताओं और उनके देशभक्तिपूर्ण व्यवहार की प्रशंसा की है।

सत्रहवीं शताब्दी के बाद यूरोप में विज्ञान तेज़ी से आगे बढ़ने लगा। कई बार इस प्रगति का विरोध रूढ़िवादी धर्मशास्त्रियों द्वारा हुआ। धार्मिक मान्यताओं ने तर्कवाद का विरोध किया, और जब डार्विन ने “विकास सिद्धांत” प्रस्तुत किया, तब तो यह विरोध चरम पर पहुँच गया। विज्ञान ने तकनीक को जन्म दिया, और दोनों मिलकर एक नए प्रकार की सामाजिक व्यवस्था की ओर बढ़ने लगे। लोकतांत्रिक और समाजवादी जीवन-दृष्टि का विकास होने लगा।

जहाँ पश्चिम में धर्म के पक्षधर लोग समय-समय पर विज्ञान की प्रगति का विरोध करते रहे, वहीं स्वामी दयानंद पहले ऐसे धार्मिक विचारक थे, जिन्होंने इन नए विचारों का खुले दिल से स्वागत किया। वे विज्ञान और वैज्ञानिक अध्ययन के पक्ष में थे, क्योंकि यह अध्ययन ईश्वर, ज्योतिष, प्रेत-विद्या आदि से जुड़े अंधविश्वासों को मिटाने में सहायता करता है — जो समाज को खोखला कर रहे थे। इसलिए वे वैज्ञानिक खोजों और वैज्ञानिक सोच के समर्थन में थे।

स्वामी दयानंद के अनुसार — ईश्वर सत्य है, उसकी सृष्टि सत्य और उद्देश्यपूर्ण है। यह न कोई सपना है, न भ्रांति, न माया — जैसा कि कुछ दार्शनिकों ने बताया है। उन्होंने कार्य-कारण के सिद्धांत की पुष्टि की और अपने पूरे दर्शन को इसी सिद्धांत पर आधारित किया।

चूंकि यह संसार वास्तविक है, इसलिए ईश्वर अपनी सृष्टि के माध्यम से प्रकट होता है। यह सृष्टि नियमबद्ध है, और इन नियमों का अध्ययन करना ही विज्ञान है।

जब इन नियमों को बड़े पैमाने पर मानव हित में लागू किया जाए, तो वह तकनीक (technology) कहलाती है। अगर विज्ञान का उपयोग विवेकपूर्वक और बुद्धिमानी से किया जाए, तो यह मानवता के लिए समृद्धि लाता है।

स्वामी दयानंद का यथार्थवादी (रिअलिस्टिक) दर्शन धन की उत्पत्ति या संचय को नकारता नहीं है, इस शर्त पर कि वह सेवा के लिए हो — शोषण के लिए नहीं। वे चाहते थे कि गृहस्थजन समृद्ध हों।

उनका धर्म का दृष्टिकोण समाजवादी था — जिसमें व्यक्ति की उपेक्षा नहीं की जाती, क्योंकि व्यक्ति को भी तो अपनी मुक्ति के लिए कर्म करना होता है।

इस समाजवादी दृष्टिकोण में यह नैतिक मूल्य माना गया कि ज़रूरतमंदों की सेवा की जाए:

• जो विद्वान् हैं, वे अशिक्षित और सत्य के जिज्ञासु लोगों को ज्ञान दें।

• जो बलशाली हैं, वे निर्बलों की रक्षा करें।

• जो धनवान हैं, वे गरीबों की सेवा करें।

जो सेवा करता है, वही सच्चे मन से प्रार्थना करता है। सेवा एक नैतिक मूल्य है।

ईश्वर हमारा पिता है, और हम सब एक-दूसरे के भाई हैं।

स्वामी दयानंद एक समन्वित दर्शन के पक्षधर थे — जिसमें समाज का संतुलित विकास हो। इसलिए वे वैज्ञानिक विकास के विरोधी नहीं थे। उनके अनुसार, विज्ञान का उपयोग अज्ञानता मिटाने और गरीबी दूर करने में होना चाहिए। इसी कारण वे विज्ञान की प्रगति का स्वागत करते हैं।

वेद, जो कि दिव्य वाणी है, वह विज्ञान, सत्य ज्ञान और उसके जीवन में प्रयोग की शिक्षा देता है।

[स्रोत : Vincit Veritas, pp. 109-10, अनुवाद एवं प्रस्तुति : भावेश मेरजा]

Bindesh Yadav
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