यह सवाल केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि पूर्वांचल के लाखों युवाओं की आवाज है—एक ऐसी आवाज, जो वर्षों से सुनाई तो देती रही है, पर अब तक पूरी तरह सुनी नहीं गई। बस्ती, जो उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र का एक प्रमुख जनपद है, आज भी उच्च शिक्षा के बुनियादी ढांचे के मामले में उस स्थान पर नहीं पहुंच पाया है, जिसका वह हकदार है। यह स्थिति तब और अधिक चिंताजनक हो जाती है, जब हम देखते हैं कि आसपास के जिलों में शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षाकृत बेहतर प्रगति हुई है। बस्ती की भौगोलिक स्थिति इसे एक स्वाभाविक शैक्षिक केंद्र बनाती है। संत कबीर नगर, सिद्धार्थनगर और अंबेडकर नगर जैसे जिलों से घिरा यह क्षेत्र लाखों छात्रों के लिए उच्च शिक्षा का संभावित केंद्र हो सकता है। लेकिन विडंबना यह है कि यहां के विद्यार्थियों को आज भी स्नातकोत्तर और शोध स्तर की पढ़ाई के लिए गोरखपुर स्थित दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, या फिर लखनऊ, प्रयागराज, वाराणसी और दिल्ली जैसे शहरों की ओर जाना पड़ता है। यह पलायन केवल दूरी का मामला नहीं है; यह अवसरों की असमानता का प्रतीक है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए अपने बच्चों को बाहर पढ़ाना आसान नहीं होता। किराया, भोजन, कोचिंग और अन्य खर्च मिलाकर उच्च शिक्षा एक महंगी प्रक्रिया बन जाती है। नतीजतन, अनेक प्रतिभाशाली छात्र अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। यह केवल व्यक्तिगत हानि नहीं, बल्कि पूरे समाज की बौद्धिक क्षति है।
हालांकि, पूर्वांचल में उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु के रूप में सामने आता है, जिसकी स्थापना सिद्धार्थनगर में हुई। इस विश्वविद्यालय ने यह साबित कर दिया कि यदि किसी अपेक्षाकृत पिछड़े जिले में भी उच्च शिक्षण संस्थान स्थापित किया जाए, तो वह हजारों-लाखों छात्रों के लिए अवसरों के द्वार खोल सकता है। इस उदाहरण के बाद यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि बस्ती जैसे बड़े और केंद्रीय जनपद को अब तक इस सुविधा से वंचित क्यों रखा गया है। इस मुद्दे का एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहलू भी है। खासकर छात्राओं के लिए बाहर जाकर पढ़ाई करना कई बार संभव नहीं हो पाता। सुरक्षा, सामाजिक मान्यताएं और पारिवारिक सीमाएं उनके रास्ते में बाधा बनती हैं। यदि बस्ती में ही विश्वविद्यालय स्थापित हो जाए, तो यह हजारों छात्राओं के लिए उच्च शिक्षा का मार्ग प्रशस्त कर सकता है और समाज में लैंगिक समानता को मजबूत कर सकता है।
बस्ती की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि भी इसे विश्वविद्यालय के लिए उपयुक्त बनाती है। इसके निकट स्थित श्रावस्ती प्राचीन काल में ज्ञान और बौद्धिक विमर्श का एक प्रमुख केंद्र रहा है। यह क्षेत्र आज भी उसी बौद्धिक परंपरा को आगे बढ़ाने की क्षमता रखता है, बशर्ते उसे उचित संसाधन और अवसर मिलें। नीतिगत दृष्टि से भी यह मांग पूरी तरह से उचित है। यशपाल समिति की रिपोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि उच्च शिक्षा का विस्तार छोटे शहरों और जिलों तक किया जाना चाहिए, ताकि क्षेत्रीय असमानताओं को कम किया जा सके। इसी तरह राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी बहुविषयक विश्वविद्यालयों की स्थापना और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा प्रणाली विकसित करने पर जोर देती है। बस्ती में विश्वविद्यालय की स्थापना इन दोनों दृष्टिकोणों को जमीन पर उतारने का एक प्रभावी माध्यम हो सकती है। आर्थिक दृष्टि से भी विश्वविद्यालय की स्थापना एक बड़ा बदलाव ला सकती है। किसी भी क्षेत्र में विश्वविद्यालय केवल शिक्षा का केंद्र नहीं होता, बल्कि वह रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का भी केंद्र बन जाता है। छात्रावास, पुस्तकालय, कोचिंग संस्थान, परिवहन सेवाएं, छोटे-बड़े व्यवसाय—ये सभी विश्वविद्यालय के आसपास विकसित होते हैं और हजारों लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं। इस दृष्टि से विश्वविद्यालय बस्ती के लिए एक “विकास इंजन” साबित हो सकता है।
साथ ही, बस्ती में स्थापित होने वाला विश्वविद्यालय क्षेत्र की विशिष्ट समस्याओं पर केंद्रित शोध को बढ़ावा दे सकता है। पूर्वांचल में बाढ़, कृषि संकट, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और ग्रामीण विकास जैसी चुनौतियां हैं, जिनका समाधान स्थानीय स्तर पर शोध और नवाचार के माध्यम से ही संभव है। विश्वविद्यालय इन समस्याओं के समाधान में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि बस्ती एक प्रमुख जिला मुख्यालय व तीन जनपदों को मिलाकर कमिश्नरी हेडक्वार्टर होने के बावजूद अभी तक विश्वविद्यालय जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है, जबकि आसपास के जिलों में यह सुविधा उपलब्ध हो चुकी है। यह स्थिति विकास की असमानता को दर्शाती है और इस बात की ओर संकेत करती है कि बस्ती को उसका उचित स्थान नहीं मिल पाया है। अब सवाल यह नहीं है कि बस्ती में विश्वविद्यालय की जरूरत है या नहीं—यह बात
पूरी तरह स्पष्ट है। असली सवाल यह है कि यह जरूरत कब पूरी होगी? कब बस्ती के युवाओं को अपने ही जिले में उच्च शिक्षा का अवसर मिलेगा? कब उन्हें अपने सपनों को पूरा करने के लिए घर से दूर जाने की मजबूरी खत्म होगी?
इस सवाल का जवाब सरकार, नीति-निर्माताओं और जनप्रतिनिधियों के पास है। लेकिन यह जवाब तभी सामने आएगा, जब समाज के सभी वर्ग इस मांग के लिए एकजुट होकर आवाज उठाएंगे। यह केवल एक मांग नहीं, बल्कि बस्ती के भविष्य का सवाल है। अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि बस्ती को विश्वविद्यालय स्थापना का उसका हक मिलना ही चाहिए—और वह भी जल्द से जल्द। क्योंकि जब शिक्षा का अधिकार सबका है, तो अवसर भी सबको समान रूप से मिलना चाहिए।














