स्कूल जाने की उम्र में जिन हाथों में कॉपी-किताबें होनी चाहिए थीं, आज उन मासूमों के सिर पर पानी की बाल्टियां हैं। यूपी के चित्रकूट में बूंद-बूंद पानी को तरसते मासूम बच्चे और ग्रामीण जब थक-हार गए, तो व्यवस्था को जगाने के लिए विकास खंड कार्यालय पर ही धरने पर बैठ गए। यह कोई एक दिन की बात नहीं है, लंबे समय से इस इलाके के लोग शुद्ध पेयजल के लिए तरस रहे हैं, लेकिन बार-बार की शिकायतों के बाद भी प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
चित्रकूट ही नहीं, बल्कि प्रदेश के कोने-कोने से आ रही पानी की ये हाहाकार मचाती तस्वीरें चीख-चीखकर ‘अमृतकाल’ के दावों की पोल खोल रही हैं। धरातल पर प्यास से तड़पती जनता और कागजों पर बहती विकास की नदियां ही भाजपा के इस कथित अमृतकाल की असली और क्रूर हकीकत हैं।











