
सीएम योगी आदित्यनाथ मंगलवार बस्ती जिले के बसहवा पहुंचे, जहां उन्होंने सरस्वती विद्या मंदिर बसहवा का भूमि पूजन और शिलान्यास किया। सीएम का हेलिकॉप्टर कार्यक्रम स्थल के पास बने हेलीपैड पर उतरते ही कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों ने जोरदार स्वागत किया।

कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गोरक्ष प्रांत के प्रांत प्रचारक रमेश जी, क्षेत्र संगठन मंत्री हेमचंद्र, विद्यालय समिति के अध्यक्ष गोपाल गाडिया, प्रबंधक सुरेंद्र प्रताप सिंह, कोषाध्यक्ष प्रह्लाद मोदी और प्रधानाचार्य गोविंद सिंह मौजूद रहे। सभी ने मुख्यमंत्री का स्वागत करते हुए विद्यालय की उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं की जानकारी साझा की।

सीएम ने जमता को संबोधित करते हुए सरस्वती शिशु मंदिर के इतिहास और कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षा के बारे में बताया। सीएम ने देश की आजादी और कश्मीर में धारा 370 के लागू होने के बारे में भी बताया।
नीचे सिलसिलेवार पढ़िए सीएम ने क्या-क्या कहा-
बस्ती में सीएम योगी बोले- आज यह मेरा सौभाग्य है कि मुझे महर्षि वशिष्ठ की स्मृति से जुड़ी इस पावन धरा पर भूमि पूजन कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर मिला है। मंदिर के एक बड़े प्रकल्प को अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान विद्या भारती के तत्वावधान में नए रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ है। मैं सबसे पहले विद्या भारती परिवार और सरस्वती शिशु मंदिर से जुड़े सभी लोगों को इस कार्य के लिए शुभकामनाएं देता हूं। भारतीय मनीषा ने ज्ञान के बारे में कहा है- सा विद्या या विमुक्तये। यानी विद्या वही है, जो हमारी मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करे।
यह देश 1947 में स्वतंत्र हुआ। लेकिन उसके बाद जिन कारणों से यह देश परतंत्र हुआ था, उनका समाधान करने और फिर से देश गुलाम न होने पाए, इसके लिए स्वतंत्र भारत ने तत्काल कोई भी उपचारात्मक उपाय नहीं किए। इन्हीं विसंगतियों को दूर करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में नानाजी देशमुख के नेतृत्व में गोरखपुर में सरस्वती शिशु मंदिर की पहली शाखा स्थापित की गई। यह गोरख प्रांत इसलिए सौभाग्यशाली है कि उसे विद्या भारती के शिक्षण संस्थानों का गौरव प्राप्त है।
सीएम ने शिशु मंदिर के इतिहास के बारे में बताया
भारत में कैसी शिक्षा होनी चाहिए, आजादी के पांच साल बाद भी तत्कालीन सरकारें इस दिशा में ठोस प्रयास नहीं कर पाईं। तब नानाजी ने इस प्रयास को आगे बढ़ाया। इसके पीछे का ध्येय यही था कि भारत की भारतीयता से ओतप्रोत ऐसे शिक्षण संस्थानों की स्थापना हो, जो भारत को उसकी आत्मा के अनुरूप फिर से विश्वगुरु बना सकें।
शिक्षा के मंदिरों से ही इसकी शुरुआत होती है। शिक्षण संस्थान केवल ज्ञान का माध्यम नहीं हैं, बल्कि बालक के सर्वांगीण विकास की आधारशिला हैं। और यदि शिक्षा संस्कारयुक्त नहीं है, आदर्शों और मूल्यों पर आधारित नहीं है, तथा राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव नहीं पैदा कर पा रही है, तो वह शिक्षा नहीं बल्कि भटकाव है।

यह एक चुनौती थी। सरकार पाठ्यक्रम तय करती है, सहयोग करे या न करे यह भी सरकार तय करती है। लेकिन बिना सरकारी सहायता के, स्वयंसेवकों के सहयोग और भारतीयता के प्रति अनुराग रखने वाले नागरिकों के माध्यम से सरस्वती शिशु मंदिर ने इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। गोरखपुर में जब पहला सरस्वती शिशु मंदिर स्थापित हुआ था तो उसमें छात्रों की संख्या मात्र 5 थी। और आज 12,000 से अधिक विद्यालय केवल सरस्वती शिशु मंदिर के हैं। ़

सीएम ने कहा- भारत को विकसित भारत बनाना है
कोई भी देश शक्तिशाली, समर्थ और आत्मनिर्भर तभी हो सकता है, जब उसकी शिक्षा मजबूत हो। दुनिया में जब समृद्धि की चर्चा होती है, तो सबसे पहले शिक्षा का पैरामीटर देखा जाता है। इसके बाद स्वास्थ्य, कृषि और जल संसाधनों को प्राथमिकता दी जाती है। इसके साथ कौशल विकास और रोजगार को जोड़ा जाता है और फिर पर्यावरण को ध्यान में रखकर विकास का स्वरूप तय किया जाता है। इन सभी पैरामीटरों के संतुलन से ही समग्र विकास संभव है।
आपको याद होगा, भारत की आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष पर पीएम मोदी ने देशवासियों से आगामी 25 वर्षों की कार्ययोजना बनाने का आह्वान किया था। उन्होंने कहा था कि भारत को विकसित भारत बनाना है। यह तभी संभव होगा जब हम इन पंच प्रणों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएंगे।
सीएम ने कहा- 1953 से 2019 तक कश्मीर में अलग व्यवस्था चलती थी
हमें अपनी विरासत का सम्मान करना होगा। हमें अपने पूर्वजों और परंपराओं पर गौरव करना होगा। 1953 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उद्घोष किया था- एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान नहीं चलेंगे। इसके लिए उन्हें अपना बलिदान देना पड़ा। 1953 से 2019 तक कश्मीर में अलग व्यवस्था चलती रही।
धारा 370 कांग्रेस ने बाबा साहब की असहमति के बावजूद जबरन लागू की थी। लेकिन पीएम मोदी ने मुखर्जी के इस संकल्प को साकार किया। कश्मीर को आतंकवाद और भारत-विरोधी गतिविधियों से मुक्त कर भारत के कानून से जोड़ा गया। इसी तरह 500 वर्षों का इंतजार तब खत्म हुआ जब अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर का निर्माण हुआ। विपक्षी दलों को लगता था यह नहीं होना चाहिए, लेकिन रामभक्तों का संकल्प अडिग रहा। प्रभु श्रीराम भारतीयता के प्रतीक और आदर्श हैं।
भगवान राम और रामायण के बारे में सीएम ने बताया
महर्षि वाल्मीकि ने जब नारदजी से पूछा कि मुझे किस आदर्श पर लिखना चाहिए, तो नारदजी ने कहा- वर्तमान में श्रीराम का चरित्र ही ऐसा है, जिस पर लिखा जा सकता है। और फिर महर्षि ने लिखा- रामो विग्रहवान् धर्मः, यानी राम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं। उसी से हमें रामायण जैसा विश्व का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य मिला।
गुलामी की मानसिकता देश में गहरी पैठ बना चुकी थी। भारतीय को हीन समझा जाता था और विदेशी को श्रेष्ठ। लेकिन बीते 11 वर्षों में इस मानसिकता पर रोक लगी है। आज गर्व से कहा जा सकता है कि भारतीय ही श्रेष्ठ हैं।
400 साल पहले भारत दुनिया की नंबर-1 अर्थव्यवस्था था। वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान 25% था। लेकिन 1947 में आजादी के समय यह घटकर केवल 2% रह गया। हमने हिंदी-संस्कृत की जगह अंग्रेजी को भारतीयता का प्रतीक मान लिया। जबकि भारत के पास न बल की कमी थी, न बुद्धि की।
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