जनपद मुख्यालय बस्ती में प्रवेश का एक प्रमुख मार्ग अमहट पुल से होकर गुजरता है। यह पुल कुआनो नदी के ऊपर बना है और शहर की देहरी पर कदम रखते ही प्रशासनिक उपस्थिति का अहसास कराता है। पुल पार करते ही बाईं ओर हाल ही में स्थापित अमहट पुलिस चौकी और दाईं तरफ नव-निर्मित सरदार वल्लभभाई पटेल स्मृति उद्यान का भव्य प्रवेशद्वार दिखाई देता है। सुसज्जित हरियाली, सलीके से बने पथ और उद्घाटन का ताजा शिलापट्ट—यह सब मिलकर एक ऐसे शहर की छवि गढ़ते हैं जो विकास, अनुशासन और स्वच्छता के दावों के साथ आगे बढ़ रहा है।
उद्यान से सटे एक प्राचीन शिव मंदिर और सामने बनी धर्मशाला की दीवार पर टंगा बड़ा फ्लैक्स बोर्ड इस छवि को कानूनी मजबूती देता है। बोर्ड पर उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, क्षेत्रीय कार्यालय बस्ती की “आवश्यक सूचना” अंकित है। इसमें राष्ट्रीय हरित अधिकरण, नई दिल्ली में योजित ओ०ए० नं० 613/2022 (एम०ए० सं० 57/2025) राम मिलन साहनी बनाम स्टेट ऑफ यू०पी० व अन्य में 26 जुलाई 2024 को पारित आदेश का हवाला है। आदेश स्पष्ट करता है कि सड़क किनारे, नदियों, जलमार्गों, आर्द्रभूमि, झीलों, नालों, पंचायत या राज्य भूमि तथा विभिन्न प्राधिकरणों के स्वामित्व वाली भूमि पर ठोस अपशिष्ट डालना पूर्णतः प्रतिबंधित है। प्रथम उल्लंघन पर 5,000 रुपये और पुनरावृत्ति पर 10,000 रुपये तक का जुर्माना; बल्क अपशिष्ट उत्पादकों—होटल, रेस्टोरेंट, बैंक्वेट हॉल, मैरिज हॉल, गेस्ट हाउस, संस्थान—पर 25,000 से 50,000 रुपये तक का पर्यावरणीय दंड। भुगतान न होने पर भू-राजस्व की भांति वसूली का प्रावधान भी दर्ज है। भाषा कठोर है, चेतावनी साफ है और संदेश निर्विवाद—नदी और सार्वजनिक भूमि पर कचरा डालना अब अपराध है।
लेकिन शहर की कहानी इस फ्लैक्स पर समाप्त नहीं होती। अमहट से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर, बस्ती सदर विकासखंड के पग्राम पंचायत कोइलपुरा की उत्तरी सीमा पर बहती रवई नदी एक दूसरी तस्वीर सामने रखती है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार यह नदी रामायण काल से जुड़ी है; कहा जाता है कि इसके जल का उद्गम श्रवण कुमार के माता-पिता के अश्रुओं से हुआ। आस्था की यह कथा नदी को केवल जलधारा नहीं, बल्कि भावनात्मक धरोहर का दर्जा देती है। नदी तट के आसपास राज्य सरकार द्वारा संचालित एक वृहद गौशाला है, उसके बगल समय माता मंदिर और ठीक सामने नगर पालिका परिषद बस्ती द्वारा स्थापित एमआरएफ (मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी) सेंटर। कागजों में यह केंद्र ठोस अपशिष्ट के पृथक्करण, पुनर्चक्रण और वैज्ञानिक निस्तारण की आधुनिक व्यवस्था का प्रतीक है। परंतु जमीनी हकीकत में यहां खुले में पड़ा मिश्रित कचरा, प्लास्टिक की उड़ती थैलियां, सड़ांध और बिखरे अवशेष दिखाई देते हैं। नदी के किनारे और धार्मिक स्थल की छाया में कूड़े का यह अंबार उस फ्लैक्स पर लिखे हर शब्द से प्रश्न करता है।
यह विरोधाभास केवल सौंदर्य या नैतिकता का प्रश्न नहीं, बल्कि कानून और क्रियान्वयन की खाई का संकेत है। जब राष्ट्रीय हरित अधिकरण का आदेश पूरे उत्तर प्रदेश में लागू है, तो क्या नदी तट पर खुले में कचरा जमा होना उसी आदेश का उल्लंघन नहीं है? यदि नियम सड़क किनारे कूड़ा डालने पर प्रतिबंध लगाते हैं, तो क्या एमआरएफ सेंटर के नाम पर अनियंत्रित ढेर लगाना नियमों की भावना के विरुद्ध नहीं? यहां प्रश्न किसी एक संस्था का नहीं, बल्कि जवाबदेही की समूची शृंखला का है—निगरानी किसकी, कार्रवाई किसकी और जवाबदेही किसकी?
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के तहत स्थानीय निकायों की जिम्मेदारी है कि वे स्रोत पर कचरे का पृथक्करण सुनिश्चित करें, डोर-टू-डोर कलेक्शन की व्यवस्था करें और एमआरएफ केंद्रों को वैज्ञानिक ढंग से संचालित करें। वैज्ञानिक संचालन का अर्थ है—ढंके हुए शेड, रिसाव (लीचेट) नियंत्रण, नियमित परिवहन, सूखे-गीले कचरे का पृथक्करण और आसपास के पर्यावरण की सुरक्षा। यदि नदी तट पर मिश्रित कचरा खुले में पड़ा है, तो यह न केवल नियमों की भावना के विरुद्ध है, बल्कि जल (प्रदूषण निवारण) अधिनियम, 1974 की मूल अवधारणा—जल स्रोतों की रक्षा—के भी विपरीत है।
पर्यावरणीय दृष्टि से देखें तो स्थिति चिंताजनक है। खुले में पड़ा ठोस अपशिष्ट वर्षा के दौरान रिसाव उत्पन्न करता है, जो भूजल में मिल सकता है। प्लास्टिक और हल्का कचरा हवा या पानी के बहाव से सीधे नदी में पहुंच सकता है। गौशाला की निकटता पशुओं के स्वास्थ्य पर जोखिम बढ़ाती है; कई बार पशु प्लास्टिक या विषाक्त पदार्थ निगल लेते हैं। धार्मिक स्थल के आसपास सड़ांध और मच्छरों का प्रकोप सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। नदी, जो लोककथा में करुणा और त्याग का प्रतीक है, आधुनिक लापरवाही की साक्षी बन जाती है।
यहां प्रशासनिक विरोधाभास और तीखा हो उठता है। अमहट पुल के पास लगे फ्लैक्स पर जुर्माने की चेतावनी है—संदेश यह कि सार्वजनिक भूमि और नदी तट पर कूड़ा डालना अस्वीकार्य है। दूसरी ओर रवई तट पर, उसी प्रशासनिक ढांचे के अंतर्गत, कूड़े का ढेर दिखाई देता है। क्या नियम केवल नागरिकों और निजी संस्थानों के लिए हैं? यदि स्थानीय निकाय स्वयं संचालन में चूक करे, तो दंड का प्रावधान किस पर लागू होगा? जांच और जुर्माने का अधिकार जिस संस्था के पास है, यदि वही संस्था संचालन में विफल हो, तो निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित होगी? यह प्रश्न केवल बस्ती का नहीं, बल्कि शहरी शासन की विश्वसनीयता का है।
आंकड़ों की भाषा में बात करें तो नगर क्षेत्रों में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाले ठोस अपशिष्ट की मात्रा लगातार बढ़ रही है। यदि स्रोत-स्तर पर पृथक्करण प्रभावी न हो, तो एमआरएफ सेंटर पर दबाव बढ़ता है और कचरा खुले में जमा होने लगता है। ऐसे में जुर्माने की चेतावनी से अधिक आवश्यक है प्रणालीगत सुधार। पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है—पिछले एक वर्ष में कितने जुर्माने लगाए गए, कितनी राशि वसूल हुई, एमआरएफ सेंटर की क्षमता क्या है और प्रतिदिन कितना कचरा वहां आता है—ये सूचनाएं सार्वजनिक डोमेन में हों तो नागरिक विश्वास बढ़ेगा। सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारियां यदि नियमित रूप से प्रकाशित हों, तो निगरानी स्वतः सुदृढ़ होगी।
स्थानीय निवासियों की आवाज भी इस बहस का हिस्सा है। कोइलपुरा के आसपास रहने वाले लोग बरसात में बदबू और मच्छरों की शिकायत करते हैं। मंदिर आने वाले श्रद्धालु स्वच्छता की अपेक्षा रखते हैं। गौशाला से जुड़े लोग पशुओं की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। ये आवाजें बताती हैं कि मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी है। जब आस्था-स्थल और नदी-तट के बीच कूड़े का ढेर खड़ा हो, तो यह केवल नियमों का नहीं, सामूहिक संवेदना का भी उल्लंघन है।
समाधान की दिशा स्पष्ट है, यदि इच्छाशक्ति हो। एमआरएफ सेंटर को वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप विकसित करना, ढंके हुए प्लेटफॉर्म और लीचेट प्रबंधन प्रणाली स्थापित करना, नियमित परिवहन सुनिश्चित करना और स्रोत पर पृथक्करण को कड़ाई से लागू करना—ये बुनियादी कदम हैं। नदी तट पर सीसीटीवी और संयुक्त निरीक्षण टीम—जिसमें प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, जिला प्रशासन और नागरिक प्रतिनिधि शामिल हों—नियमित निगरानी कर सकती है। निरीक्षण रिपोर्ट और की गई कार्रवाई को सार्वजनिक पोर्टल पर अपलोड करने से पारदर्शिता बढ़ेगी। स्कूलों, स्वयंसेवी संगठनों और ग्राम पंचायतों के माध्यम से जन-जागरूकता अभियान चलाकर नागरिक सहभागिता को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
अंततः प्रश्न यह नहीं कि नियम मौजूद हैं या नहीं; प्रश्न यह है कि नियमों की आत्मा कितनी जीवित है। अमहट के फ्लैक्स पर अंकित जुर्माना और रवई तट पर पड़ा कूड़ा—इन दोनों के बीच की दूरी केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक और नैतिक भी है। यदि नदी की धारा को स्वच्छ रखना है, यदि धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों की गरिमा बचानी है, यदि नागरिकों का कानून पर विश्वास कायम रखना है, तो बोर्ड पर लिखी चेतावनी को जमीन पर उतारना होगा। अन्यथा जुर्माने की स्याही सूखती रहेगी और नदी का जल प्रश्न पूछता रहेगा—क्या आदेश केवल फ्लैक्स तक सीमित हैं, या वे सचमुच हमारे शहर की दिशा तय करेंगे?
✍️ अखिल कुमार यादव















