कभी उत्तर प्रदेश का नाम लेते ही “बीमारू” शब्द अपने-आप जुड़ जाता था। यह कोई सरकारी श्रेणी नहीं थी, न किसी आयोग की आधिकारिक सूची; बल्कि 1980 के दशक में जनसांख्यिकीविद् आशीष बोस द्वारा गढ़ा गया एक विश्लेषणात्मक शब्द था, जिसने बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को एक ऐसे समूह में रखा जो गरीबी, कम साक्षरता, उच्च जनसंख्या वृद्धि, कमजोर स्वास्थ्य संकेतकों और अविकसित बुनियादी ढांचे के कारण देश की समग्र प्रगति को पीछे खींच रहे थे। उस समय यह शब्द एक चेतावनी की तरह था—यह बताने के लिए कि यदि इन राज्यों की स्थिति नहीं सुधरी, तो भारत की विकास यात्रा अधूरी रहेगी। चार दशक बाद, वही उत्तर प्रदेश अपने बारे में एक अलग कथा सुनाना चाहता है। राजस्व संतुलन, निवेश, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर, मेडिकल कॉलेजों की बढ़ती संख्या, डिजिटल सेवाओं का विस्तार—इन सबके आधार पर यह दावा किया जा रहा है कि राज्य अब “बीमारू” नहीं रहा। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह दावा केवल आर्थिक सूचकांकों की चमक से उपजा है, या सामाजिक-मानव विकास के गहरे पैमानों पर भी यह परिवर्तन उतना ही स्पष्ट है? यही वह जगह है जहाँ बहस शुरू होती है।
यदि 1990 के दशक के आसपास के उत्तर प्रदेश को देखें तो साक्षरता दर लगभग 40 प्रतिशत के आसपास थी। शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर देश में सबसे अधिक में गिनी जाती थी। प्रति व्यक्ति आय बहुत कम थी और गरीबी का अनुपात बेहद ऊँचा था। ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएँ दुर्लभ थीं, सड़कें सीमित थीं, बिजली की आपूर्ति अनिश्चित थी और रोजगार के अवसर बहुत कम। बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर थी, पर कृषि भी कम उत्पादक थी। यही वह परिदृश्य था जिसने उत्तर प्रदेश को “बीमारू” की परिभाषा में फिट बैठाया। आज तस्वीर बदली है। साक्षरता दर 67 प्रतिशत से अधिक पहुँच चुकी है। शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी आई है। प्रति व्यक्ति आय में कई गुना वृद्धि हुई है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) के अनुसार बड़ी संख्या में लोग गरीबी से बाहर आए हैं। राज्य में एक्सप्रेसवे का जाल बिछा है, नए मेडिकल कॉलेज खुले हैं, औद्योगिक निवेश बढ़ा है और डिजिटल सेवाओं का विस्तार गाँवों तक हुआ है। यह बदलाव संयोग नहीं है; यह दशकों की नीतियों, योजनाओं, संसाधनों और प्रशासनिक प्रयासों का परिणाम है।
परंतु कहानी का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) जैसे आंकड़े बताते हैं कि कुपोषण, एनीमिया, मातृ स्वास्थ्य और बाल स्वास्थ्य जैसी समस्याएँ अभी भी व्यापक हैं। बड़ी संख्या में महिलाएँ एनीमिया से ग्रस्त हैं, बच्चों में कुपोषण की समस्या अभी भी चुनौती है। इसका अर्थ यह है कि सड़कें और निवेश तेज़ी से बढ़े हैं, पर मानव विकास की रफ्तार उतनी समान नहीं रही। आर्थिक प्रगति और सामाजिक संकेतकों के बीच यह असमानता ही “बीमारू” बहस को आज भी प्रासंगिक बनाए रखती है। यहाँ यह समझना जरूरी है कि आशीष बोस ने BIMARU शब्द क्यों गढ़ा था। उनका तर्क था कि ये राज्य भारत की जनसंख्या वृद्धि, गरीबी और कम मानव विकास के कारण राष्ट्रीय प्रगति को धीमा कर रहे हैं। उस समय उनकी चिंता यह थी कि यदि इन राज्यों में स्वास्थ्य, शिक्षा और जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में सुधार नहीं हुआ, तो देश की औसत स्थिति कभी बेहतर नहीं हो पाएगी। आज प्रश्न यह है कि क्या वही तर्क अभी भी लागू होता है? या परिस्थितियाँ इतनी बदल चुकी हैं कि उस पुराने संदर्भ को नए समय में लागू करना अनुचित है?
उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था का आकार आज देश में शीर्ष राज्यों में गिना जाता है। राज्य सरकार राजस्व अधिशेष की बात करती है, बड़े निवेश सम्मेलनों का आयोजन होता है, औद्योगिक इकाइयाँ बढ़ रही हैं। लेकिन जब प्रति व्यक्ति आय की तुलना राष्ट्रीय औसत से की जाती है, तो अंतर अभी भी दिखाई देता है। इसका अर्थ यह है कि अर्थव्यवस्था का आकार भले बड़ा हो, लेकिन विशाल जनसंख्या के कारण उसका लाभ प्रति व्यक्ति स्तर पर उतना प्रभावी नहीं दिखता। क्षेत्रीय असमानता इस बहस का एक और महत्वपूर्ण पहलू है। यदि लखनऊ, नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर या वाराणसी की तस्वीर देखी जाए तो उत्तर प्रदेश एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था जैसा दिखता है। चौड़ी सड़कें, मेट्रो, आईटी पार्क, शिक्षा संस्थान, निजी अस्पताल, व्यावसायिक गतिविधियाँ—सब कुछ विकास की कहानी कहते हैं। लेकिन यदि सोनभद्र, श्रावस्ती, बलरामपुर, चित्रकूट, चंदौली या बुंदेलखंड के दूरस्थ गाँवों की ओर नजर जाए तो विकास की रफ्तार उतनी तीव्र नहीं दिखती। वहाँ आज भी स्वास्थ्य सुविधाएँ सीमित हैं, रोजगार के अवसर कम हैं और शिक्षा की गुणवत्ता चुनौती बनी हुई है। यही अंतर बताता है कि पूरे राज्य की औसत तस्वीर और जमीनी वास्तविकता के बीच अभी भी दूरी है।
एक बौद्धिक प्रश्न भी यहाँ खड़ा होता है—क्या आज के समय में किसी राज्य को “बीमार” कहना उचित है? यह शब्द स्वयं में नकारात्मक अर्थ लिए हुए है। आशीष बोस ने जिस संदर्भ में यह शब्द दिया था, वह उस दौर की चुनौतियों के अनुरूप था। आज विकास मापने के पैमाने बदल चुके हैं। मानव विकास सूचकांक (HDI), बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI), सतत विकास लक्ष्य (SDG) इंडेक्स, ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस जैसे मानक कहीं अधिक परिष्कृत और बहुआयामी तस्वीर पेश करते हैं। इन नए पैमानों के युग में “बीमारू” जैसा शब्द न केवल अपर्याप्त लगता है, बल्कि कई बार अपमानजनक भी प्रतीत होता है। फिर भी, यह शब्द पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुआ है, क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि विकास केवल राजस्व अधिशेष, निवेश या जीडीपी वृद्धि से नहीं मापा जा सकता। विकास तब सार्थक होता है जब वह स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, स्वच्छता और जीवन-स्तर में समान रूप से दिखाई दे। उत्तर प्रदेश ने आर्थिक और बुनियादी ढांचे के मोर्चे पर लंबी छलांग लगाई है, लेकिन मानव विकास के कुछ क्षेत्रों में अभी भी लगातार प्रयास की आवश्यकता है। जमीनी आवाज़ें इस बहस को और स्पष्ट करती हैं। कई गाँवों में लोग कहते हैं—”सड़क बन गई है, बिजली आ गई है, लेकिन अस्पताल में डॉक्टर अभी भी नहीं है।” यह वाक्य विकास की असमान परतों को उजागर करता है। कहीं वह चमकता है, कहीं वह अभी भी संघर्ष कर रहा है। शिक्षा के क्षेत्र में भी कई जगह स्कूल भवन तो बन गए हैं, लेकिन शिक्षकों की कमी बनी हुई है। स्वास्थ्य केंद्र मौजूद हैं, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता सीमित है। इसके साथ ही, यह भी सच है कि उत्तर प्रदेश की विशाल जनसंख्या स्वयं में एक चुनौती है। इतने बड़े पैमाने पर संसाधनों का वितरण, सेवाओं की उपलब्धता और समान विकास सुनिश्चित करना किसी भी सरकार के लिए कठिन कार्य है। इस दृष्टि से देखें तो जो प्रगति हुई है, वह कम महत्वपूर्ण नहीं है। परंतु यही विशालता यह भी सुनिश्चित करती है कि चुनौतियाँ भी बड़े पैमाने पर बनी रहें।
आज उत्तर प्रदेश को अक्सर “विकास इंजन” कहा जाता है। यह शब्द उस बदलती छवि का संकेत है, जहाँ राज्य निवेश आकर्षित कर रहा है, बुनियादी ढांचा मजबूत कर रहा है और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है। परंतु विकास इंजन होने के साथ-साथ उसे मानव विकास के इंजन के रूप में भी उभरना होगा। जब तक शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और जीवन-स्तर में व्यापक सुधार नहीं होता, तब तक “बीमारू” शब्द की छाया पूरी तरह मिट नहीं सकती, भले वह औपचारिक रूप से इस्तेमाल न किया जाए। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो उत्तर प्रदेश न तो पूरी तरह उस पुराने “बीमारू” ढांचे में फिट बैठता है, न ही पूरी तरह उससे मुक्त कहा जा सकता है। यह एक संक्रमणकालीन स्थिति है, जहाँ आर्थिक रफ्तार और सामाजिक चुनौतियाँ साथ-साथ चल रही हैं। राज्य ने अतीत की छवि को काफी हद तक बदला है, पर भविष्य की मंज़िल अभी भी कुछ दूरी पर है। शायद यही कारण है कि आज “बीमारू” शब्द पर बहस फिर से प्रासंगिक हो उठी है—लेकिन एक नए अर्थ में। अब यह शब्द किसी राज्य को नीचा दिखाने के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए इस्तेमाल हो रहा है कि विकास को किस दृष्टि से देखा जाए। क्या केवल आर्थिक आंकड़े पर्याप्त हैं, या मानव जीवन की गुणवत्ता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है?
सबसे संतुलित निष्कर्ष शायद यही है कि उत्तर प्रदेश अब “बीमारू” नहीं है, लेकिन पूरी तरह “स्वस्थ” भी नहीं कहा जा सकता। यह वह प्रदेश है जो अपनी पुरानी पहचान से बाहर निकल चुका है, पर नई पहचान को पूरी मजबूती से स्थापित करने की प्रक्रिया में है। यह वह राज्य है जो अपनी ऐतिहासिक चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ रहा है, पर रास्ते में अभी भी कुछ बाधाएँ हैं जिन्हें पार करना बाकी है।
✍️ अखिल कुमार यादव












