खामोश साजिश: कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में जेनेरिक दवाओं की बेतहाशा खपत के पीछे का रहस्य !

ग्रामीण क्षेत्र और कस्बों में सामान्य बीमारियों जैसे बुखार, खांसी, जुकाम, पेट दर्द आदि के लिए लोग अक्सर मेडिकल स्टोर से दवाएं खरीदते हैं। यहां तक कि कई बार बिना योग्यता वाले चिकित्सक से भी दवा लेने में संकोच नहीं करते। हालांकि, यहां समस्या यह है कि कई बार पढ़े-लिखे लोग भी जेनेरिक दवाओं को एमआरपी के अनुसार खरीदते हैं, जबकि वास्तव में यह दवाएं 80 प्रतिशत तक सस्ती हो सकती हैं। यह ऐसा है जैसे किसी दवा की कीमत 30 रुपये हो, लेकिन उसकी असल कीमत मात्र 10 रुपये हो।

दवा बाजार में बड़ा खेल:

दवा के बाजार में बहुत बड़े खेल चल रहे हैं। सरकार ने सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए कदम उठाए, लेकिन इसका फायदा मरीजों से ज्यादा धंधेबाजों को हुआ। ये धंधेबाज जेनेरिक दवाओं को ब्रांडेड बताकर ऊंचे दामों पर बेच देते हैं। मिलते-जुलते नाम और निगरानी की कमी के कारण ये लोग मुनाफा कमा रहे हैं जबकि मरीजों को ठगा जा रहा है।

ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं का खेल:

ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं के खेल में जानकार भी फंस सकते हैं। यह घालमेल इतने बड़े पैमाने पर होता है कि सिर्फ वही व्यक्ति इसे समझ सकता है जो दवा के व्यवसाय की बारीकी को समझता है। आम आदमी के लिए यह सब समझना मुश्किल होता है, क्योंकि उसके लिए महत्वपूर्ण यह है कि बीमारी से छुटकारा मिल जाए, कीमत की चिंता कम होती है। यही कारण है कि चालाक केमिस्ट ब्रांडेड कंपनियों की जेनेरिक दवाओं को ब्रांडेड की कीमत पर बेच देते हैं।

क्या है असली खेल:

ब्रांडेड दवाओं की एमआरपी में मार्केटिंग, स्टॉकिस्ट कमीशन, अन्य कमीशन, ट्रांसपोर्टेशन और टैक्स जैसे खर्चे जुड़े होते हैं, जबकि जेनेरिक दवाओं में ये खर्चे नहीं होते। इसके अलावा, जेनेरिक दवाओं पर कई तरह के टैक्स छूट मिलती है। उदाहरण के लिए, जो गोली ब्रांडेड में 10 रुपये की होती है, वह जेनेरिक में मात्र 2 रुपये की मिल सकती है। केमिस्ट बताते हैं कि दोनों दवाओं के साल्ट में कोई अंतर नहीं होता, केवल कीमत का खेल होता है।

सस्ती दवाओं का मंसूबा:

सेवानिवृत्त फार्मासिस्टों का मानना है कि लोगों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराने के लिए जेनेरिक दवाओं का कॉन्सेप्ट लाया गया था। लेकिन ब्रांडेड कंपनियां उन्हीं दवाओं को पांच गुना ज्यादा कीमत पर बेच रही हैं। एमआरपी पर कोई अंकुश नहीं होने के कारण इस घालमेल को रोका नहीं जा सका है। यदि एमआरपी लागत के हिसाब से निर्धारित की जाए, तो इस खेल को रोका जा सकता है।

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निष्कर्ष:

मेडिकल स्टोर से दवाओं की खरीदारी में चल रहे इस खेल ने कई लोगों को ठगा है। यह समस्या खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में ज्यादा देखने को मिलती है, जहां लोग अपनी अज्ञानता के कारण अधिक कीमत चुकाते हैं। सरकार और संबंधित अधिकारियों को इस पर ध्यान देकर इस समस्या का समाधान निकालना चाहिए, ताकि आम आदमी को सही दवा उचित कीमत पर मिल सके।

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Bindesh Yadav
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