बस्ती जनपद की पंचायतों में जब भी पुरस्कारों की चर्चा होती है, एक अद्भुत विडम्बना सामने आती है। मुख्यमंत्री पंचायत प्रोत्साहन पुरस्कार हो या अन्य प्रोत्साहन पुरस्कार, दोनों की प्रक्रिया अक्सर ऐसी उलझन पैदा कर देती है कि मेहनतकश पंचायतें किनारे खड़ी रह जाती हैं और दिखावे में माहिर पंचायतें सम्मान के मंच पर आसीन हो जाती हैं। पंचायतें विकास की असली प्रयोगशालाएँ होती हैं। यहीं से स्वच्छता, पेयजल, सड़क, शिक्षा और रोज़गार जैसी योजनाएँ जनता तक पहुँचती हैं। यही कारण है कि जब पुरस्कारों की घोषणा होती है तो ग्रामीणों की निगाहें इस पर टिक जाती हैं। सबको उम्मीद रहती है कि उन पंचायतों को चुना जाएगा जिन्होंने ईमानदारी और लगन से गाँव की तस्वीर बदली है, लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल उलट होती है। चयन की प्रक्रिया ज़्यादातर काग़ज़ों और रिपोर्टों पर टिकी होती है।
आँकड़ों और फाइलों का ऐसा ढेर सजाया जाता है कि वास्तविक सच्चाई पीछे छूट जाती है। गाँव में टूटी नालियाँ हों, अधूरी सड़कें हों या अधपके भवन—फाइलों में वे सब “कार्य प्रगति” के चमचमाते उदाहरण बन जाते हैं। ज़मीनी असमानताएँ और लोगों की परेशानियाँ कागज़ी रिपोर्टों के बीच खो जाती हैं। विडम्बना की परत और गहरी तब हो जाती है जब वर्ष 2024 के लिए मुख्यमंत्री पंचायत प्रोत्साहन पुरस्कार चयन पर नज़र डालते हैं। उस वर्ष चयनित ग्राम पंचायतों के खिलाफ एक राजनैतिक संगठन ने ठोस तथ्यों और प्रमाणों सहित उच्च अधिकारियों को शिकायती पत्र दिया। शिकायत में साफ तौर पर उल्लेख था कि चयनित पंचायतों के कार्यों में गंभीर अनियमितताएँ हैं, अनेक योजनाएँ अधूरी हैं और अधिकांश उपलब्धियाँ केवल काग़ज़ों पर ही दर्शाई गई हैं। यह मामला अधिकारियों तक पहुँचा भी, लेकिन उस शिकायती पत्र पर क्या कार्यवाही हुई—यह आज तक रहस्य के पर्दे में छिपा हुआ है।
संबंधित अधिकारी न तो जवाब देने को तैयार हैं और न ही पारदर्शिता दिखाने को। यह स्थिति न केवल शिकायत करने वालों की उम्मीदों को तोड़ती है, बल्कि यह स्पष्ट संदेश भी देती है कि व्यवस्था की नज़र में सच्चाई और प्रमाणों की कोई विशेष अहमियत नहीं है। ऐसे उदाहरण यह सिद्ध कर देते हैं कि पंचायत पुरस्कारों की प्रक्रिया अब भी “काग़ज़ी उपलब्धियों” और “दिखावे” के इर्द-गिर्द घूम रही है। यदि ठोस शिकायतों और प्रमाणों के बावजूद पंचायतों को सम्मानित और संतृप्त किया जाएगा, तो मेहनतकश प्रधानों और ईमानदार जनप्रतिनिधियों के मनोबल पर इसका कितना गहरा असर पड़ेगा, इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है।
विडम्बना का दूसरा पहलू तब सामने आता है जब किसी बड़े राजनेता, मंत्री, प्रभारी मंत्री या नोडल अधिकारी का दौरा होता है। उस समय अधिकारियों की प्राथमिकता अचानक बदल जाती है। ऐसे अवसर पर वही पंचायतें चुनी जाती हैं जिन्होंने धरातल पर काम किया है और जिनके गाँव साफ-सुथरे दिखते हैं। जिनकी सड़कें और नालियाँ सचमुच काम करती हैं और जहाँ लोग गर्व से कहते हैं—”हमारा गाँव सचमुच बदला है।” दौरे की तस्वीरें, रिपोर्टें और नेताओं के भाषण सब इन्हीं पंचायतों के इर्द-गिर्द घूमते हैं। लेकिन जैसे ही पुरस्कारों की सूची तैयार होती है, तस्वीर फिर उलट जाती है। असली काम करने वाली पंचायतें सूची से गायब हो जाती हैं
और दिखावे वाली पंचायतें विजेता बनकर उभरती हैं। गाँव के लोग इस खेल को भलीभाँति समझ चुके हैं। जब उनके गाँव का नाम दौरे के लिए चुना जाता है तो वे खुशी से भर जाते हैं और कहते हैं—”देखो, मंत्री जी हमारे गाँव में आएंगे, क्योंकि हमने सच्चा काम किया है।” लेकिन जब इनाम की बारी आती है और नाम किसी दूसरी पंचायत का निकलता है, तो यही लोग हताश होकर कहते हैं—”हम मेहनत किए, मगर इनाम दिखावे वालों को मिला।” यह विरोधाभास ग्रामीण मन में गहरी पीड़ा और अविश्वास छोड़ जाता है।
असल में जो पंचायतें प्रेरणा का स्रोत होनी चाहिए थीं, वे केवल दिखावे तक सीमित रह जाती हैं और जो पंचायतें पुरस्कार पाती हैं, वे ग्रामीण समाज में उपहास का कारण बन जाती हैं। यह स्थिति मेहनतकश प्रधानों का मनोबल तोड़ देती है। जिन प्रधानों ने ईमानदारी से काम किया, वे जब देखते हैं कि पुरस्कार किसी दूसरी पंचायत को मिल गया, तो उनके मन में यह भावना बैठ जाती है कि मेहनत का कोई मूल्य नहीं। धीरे-धीरे यह निराशा पूरे तंत्र में फैलने लगती है और संदेश यह जाता है कि “काम करो या न करो, बस आँकड़े सजाओ, फोटो खिंचवाओ और इनाम जीत लो।” यह मानसिकता पंचायतों के मूल उद्देश्य को ही नकार देती है।
विडम्बना का यह सिलसिला केवल वर्तमान तक सीमित नहीं है बल्कि भविष्य की संभावनाओं को भी गहरी चोट पहुँचाता है। इस समय उत्तर प्रदेश सरकार “विकसित उत्तर प्रदेश 2047” की अवधारणा का प्रचार-प्रसार कर रही है और जनता से सुझाव भी माँग रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में लाने का सपना रखा है। 2047 तक का यह लक्ष्य केवल काग़ज़ों और भाषणों का विषय नहीं है, बल्कि हर स्तर पर ईमानदार प्रयासों की माँग करता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या पंचायतों की यह जमीनी सच्चाई उस सपने को पूरा करने की राह आसान बनाएगी या और कठिन बना देगी?
यदि मेहनत और ईमानदारी की अनदेखी होती रही और दिखावे व काग़ज़ी विकास को ही पुरस्कृत किया जाता रहा, तो क्या “विकसित उत्तर प्रदेश 2047” और “विकसित भारत@2047″ की परिकल्पना कभी हकीकत बन पाएगी? गाँव और पंचायतें ही इस सपने की नींव हैं। यदि नींव ही कमजोर रहेगी तो विकास की इमारत कितनी भी ऊँची क्यों न बनाई जाए, टिक नहीं पाएगी। जिस समाज में मेहनत को हाशिए पर धकेलकर दिखावे को इनाम दिया जाता हो, वहाँ ईमानदार लोग धीरे-धीरे किनारे हो जाते हैं और कामचोर व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं। पंचायतें यदि “विकास की प्रयोगशालाएँ” बनने की बजाय “प्रदर्शन की प्रयोगशालाएँ” बन जाएँगी,
तो भविष्य का सपना अधूरा रह जाएगा। इसलिए ज़रूरी है कि पंचायत पुरस्कारों की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष हो। मूल्यांकन केवल काग़ज़ों और आँकड़ों पर नहीं, बल्कि जमीनी सच्चाई पर आधारित होना चाहिए। इसके लिए स्वतंत्र एजेंसियों से सत्यापन कराना, जनसुनवाई के जरिए पंचायतों के काम का आकलन करना और ग्रामीणों की राय को महत्व देना बेहद आवश्यक है। यदि पंचायतों के काम का स्वतंत्र सत्यापन हो और असली मेहनत करने वाली पंचायतों को ही सम्मान मिले, तो न केवल प्रधानों का मनोबल बढ़ेगा, बल्कि पूरे प्रदेश में सकारात्मक संदेश जाएगा कि “काम करने से ही सम्मान मिलेगा।” यही संदेश लोगों को सच्चे काम के लिए प्रेरित करेगा।
2047 का सपना केवल नीतियों, योजनाओं और भाषणों से पूरा नहीं होगा। इसकी असली बुनियाद गाँवों और पंचायतों में रखी जाएगी। पंचायतें यदि सही दिशा में आगे बढ़ेंगी तो ही उत्तर प्रदेश 2047 तक विकसित राज्यों की श्रेणी में आएगा और भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बन पाएगा। इसके लिए ईमानदारी, पारदर्शिता और निष्पक्षता ही सबसे बड़ी शर्त है।
अन्यथा यह विडम्बना बार-बार हमारे सामने खड़ी होगी—
“जो पंचायत सचमुच गाँव बदलती है, वह ताली पाती है, और जो पंचायत केवल आँकड़े सजाती है, वह इनाम जीत ले जाती है।”
✍️ अखिल कुमार यादव












