उत्तर प्रदेश की राजनीति में बेहद सक्रिय और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तथा पंचायती राज मंत्री श्री ओमप्रकाश राजभर को हाल ही में अचानक माइनर स्ट्रोक आया। यह खबर जैसे ही सामने आई, समर्थक हों या विरोधी, सबने उनके शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की दुआ की। लेकिन इस घटना के पीछे एक और कहानी छुपी थी, जिसने प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर गहरे सवाल खड़े कर दिए। राजभर जी को आनन-फानन में लखनऊ के डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, जो कि प्रदेश का प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल है, ले जाया गया। उस समय प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री और उपमुख्यमंत्री श्री बृजेश पाठक स्वयं उनके साथ मौजूद थे। सामान्य रूप से देखा जाए तो किसी भी मरीज के लिए इससे बेहतर आश्वासन क्या हो सकता है कि उसके साथ स्वास्थ्य मंत्री स्वयं खड़े हों और इलाज सरकारी अस्पताल में हो रहा हो। लेकिन चौंकाने वाली बात यह रही कि कुछ ही देर बाद राजभर जी को वहीं से निकालकर लखनऊ के ही मेदांता प्राइवेट अस्पताल में भर्ती करना पड़ा।
यह घटना केवल एक राजनीतिक नेता की बीमारी तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि इसने हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था की असली तस्वीर सामने ला दी। सवाल यह उठता है कि जब खुद प्रदेश सरकार के मंत्री और स्वास्थ्य विभाग की कमान संभालने वाले उपमुख्यमंत्री की मौजूदगी में भी सरकारी अस्पताल पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तो फिर आम जनता किस पर भरोसा करे? क्या सरकारी अस्पताल अब केवल गरीबों की मजबूरी भर रह गए हैं? और अगर यही सच है, तो फिर उन लाखों-करोड़ों रुपयों का क्या होता है जो हर साल इन अस्पतालों की व्यवस्था सुधारने के नाम पर खर्च किए जाते हैं?
राजभर जी की बीमारी ने हमें दो अलग-अलग दुनिया की झलक दिखाई। एक तरफ सरकारी अस्पताल है, जहां बड़े-बड़े भवन, आधुनिक उपकरण और कागजों पर दर्ज लंबी-चौड़ी सुविधाओं की सूची मौजूद है, लेकिन जब असल में भरोसा करने की घड़ी आती है, तो खुद मंत्री भी वहां रुकना नहीं चाहते। दूसरी तरफ प्राइवेट अस्पताल हैं, जहां पैसा हो तो इलाज भी है, भरोसा भी है और सुविधा भी है। इन दोनों तस्वीरों के बीच जो सबसे ज्यादा पिसता है, वह है आम आदमी।
किसी नेता या बड़े आदमी के पास हमेशा विकल्प मौजूद होता है। उनके पास एम्बुलेंस तैयार रहती है, डॉक्टरों की पूरी टीम तुरंत उपलब्ध हो जाती है, और अगर जरूरत पड़ी तो उन्हें चार्टर्ड विमान से दिल्ली, मुंबई या किसी और बड़े शहर ले जाया सकता है। लेकिन एक किसान, मजदूर, रिक्शेवाला या आम नौकरीपेशा व्यक्ति इस व्यवस्था में कहां जाएगा? उसकी हालत में तो सरकारी अस्पताल ही अंतिम सहारा होता है। मगर वही अस्पताल अगर इतना अविश्वसनीय हो चुका है कि खुद सरकार के मंत्री वहां इलाज कराने से बचें, तो फिर आम आदमी का भविष्य किस दिशा में जाएगा? यही इस पूरी घटना का सबसे बड़ा सवाल है।
विडंबना यह है कि नेता जब जनता के बीच जाते हैं तो अक्सर यही दावा करते हैं कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से कहीं ज्यादा बेहतर हो चुकी है। नए अस्पतालों के उद्घाटन होते हैं, पुराने अस्पतालों को अपग्रेड करने की घोषणाएं होती हैं, और मीडिया के सामने यह बयान दोहराया जाता है कि अब मरीजों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होगी। लेकिन सच तब सामने आता है जब बीमारी नेता को घेरती है। जब नेता बीमार पड़ते हैं तो उन्हें सरकारी अस्पताल की याद नहीं आती, बल्कि सीधे प्राइवेट अस्पतालों के दरवाजे खुल जाते हैं। वहीं आम जनता जब बीमार पड़ती है तो न तो उसके पास महंगे अस्पतालों में जाने की हैसियत होती है और न ही उसके लिए किसी वीआईपी इलाज का इंतजाम होता है। वह सरकारी अस्पतालों की लंबी कतारों में घंटों खड़ा रहता है, कभी दवा खत्म हो जाती है, कभी डॉक्टर अनुपस्थित मिलते हैं, कभी जांच मशीनें खराब निकलती हैं। कई बार तो स्ट्रेचर तक नहीं मिल पाता और मरीज को परिजन ही उठाकर वार्ड तक ले जाते हैं।
यह दोहरी व्यवस्था हमारे पूरे स्वास्थ्य तंत्र की सबसे बड़ी बीमारी है। एक व्यवस्था नेताओं और अमीरों के लिए है, जिसमें प्राइवेट अस्पताल और बेहतरीन सुविधाएं शामिल हैं। दूसरी व्यवस्था आम जनता के लिए है, जिसमें सरकारी अस्पताल, लापरवाही और अव्यवस्था शामिल है। यह सच जितनी जल्दी स्वीकार कर लिया जाए, उतना ही बेहतर होगा। सवाल यह नहीं है कि ओमप्रकाश राजभर को मेदांता क्यों ले जाया गया, सवाल यह है कि लोहिया जैसे बड़े सरकारी संस्थान पर भरोसा क्यों नहीं किया गया। अगर वहां सभी आधुनिक सुविधाएं और विशेषज्ञ मौजूद हैं, तो फिर नेता वहां क्यों नहीं रुके? और अगर वहां भरोसा नहीं किया जा सकता, तो फिर उस अस्पताल के नाम पर जनता को झूठी उम्मीदें क्यों दिखाई जाती हैं?
राजभर जी की बीमारी ने एक बार फिर यह सच्चाई उजागर कर दी है कि हमारे देश में स्वास्थ्य व्यवस्था पर जितना दिखावा होता है, उतना भरोसा नहीं। नेता बच जाएंगे, क्योंकि उनके पास विकल्प मौजूद है। वे किसी भी समय प्राइवेट अस्पताल जा सकते हैं, चाहे वह लखनऊ का मेदांता हो या मुंबई की लीलावती। लेकिन आम जनता के पास कोई विकल्प नहीं है। उसके लिए सरकारी अस्पताल ही सबकुछ है, और अगर वहीं से भरोसा उठ गया तो फिर जनता किस पर भरोसा करेगी?
आज यह घटना हमें आईना दिखाती है कि सुधार केवल घोषणाओं से नहीं होगा, बल्कि ज़मीनी हकीकत बदलनी होगी। अगर सरकार सचमुच चाहती है कि जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिले, तो सबसे पहले उसे अपने ही मंत्रियों और अधिकारियों को सरकारी अस्पतालों पर निर्भर करने के लिए बाध्य करना होगा। तभी जनता को यह विश्वास होगा कि हाँ, सरकारी अस्पताल भी उतने ही सक्षम हैं जितने प्राइवेट। वरना ऐसे हर वाकये के बाद यही सवाल बार-बार गूंजता रहेगा— जब नेता ही सरकारी अस्पतालों पर भरोसा नहीं करते, तो जनता किस पर करे?
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