1- चीन भारत ( लद्दाख) के 4,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया है, सोनम वांचुक पिछले पांच सालों से दोहरा रहे हैं।
भारत-चीन के बीच 2020 के संघर्ष में चीन ने भारत के 4,000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया है, यह बात लगातार सोनम वांचुक कह रहे हैं। वे इसका प्रमाण भी बार प्रस्तुत कर रहे हैं। भारत सरकार हमेशा इससे इंकार करती रही।
वांचुक ने यह साबित करने के लिए चीन ने भारत के 4,000 वर्ग किलोमीटर जमीन कब्जा कर रखा है। पश्मीना मार्च की घोषणा किया था। उनका कहना था कि यदि चीन ने भारत के उन हिस्सों पर कब्जा नहीं किया जहां 2020 से पहले लद्दाख की भेंड़-बकरियां चरने जाती थीं और उनके साथ चरवाहे जाते थे, उन जगहों तक हमें जाने की इजाजत दी जाए। इसे उन्होंने पश्मीना मार्च नाम दिया था।
पश्मीना मार्च नाम इसलिए दिया गया, क्योंकि इन्हीं भेंड़ों से पश्मीना ( ऊन) मिलता है, जो दुनिया भर में चर्चित है। भारत सरकार ने इस मार्च की इजाजत नहीं दी, बल्कि धमकी दिया कि यदि यह मार्च किया जाता है तो हम लद्दाख में धारा-144 लगा देंगे और इंटरनेट बंद कर देंगे। जिसका सीधा मतलब था कि लद्दाख के पर्यटन कारोबार को ठप्प कर दिया जाएगा यानि लद्दाख के बाशिंदों की आर्थिक रीढ़ साल भर के लिए तोड़ दी जाएगी।
यदि किसी एक व्यक्ति ने चीन द्वारा 2020 में भारत की जमीन पर कब्जे का सवाल सबसे मुखर होकर उठाया और साबित करने की कोशिश की, वह व्यक्ति सोनम वांचुक हैं।
2- सोनम वांचुक ने कार्पोरेट प्लांट के नाम पर अडानी को लद्दाख की जमीन ( चारागाह) देने का तीखा विरोध किया।
सोनम वांगचुक यह भी कहते हैं कि चारागाह की जो जमीनें कार्पोरेट घरानों को सौंपी गई हैं और सौंपी जा रही हैं, सोलर प्लांट के नाम पर या किसी और नाम पर वह बंद होना चाहिए। चरवाहों को उनकी चारागाह की जमीनें सौंपी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि चारागाह की कुछ जमीनों पर चीन ने कब्जा कर लिया है और जो बची हैं, उन्हें कार्पोरेट को सौंपा जा रहा है। वे अफसोस जताते हैं कि यही वे चारागाह हैं, जहां वे भेंडे़ं पलती हैं, जिनसे दुनिया का सबसे बेहतरीन पश्मीना मिलता है। चारागाह खत्म होंगे तो पश्मीना भी खत्म हो जाएगा।
3-सोनम वांचुक लद्दाख के कार्पोरेट मॉडल के विकास के खिलाफ अभियान लगातार अभियान चला रहे हैं।
वांचुक का कहना है कि हिमालय के पर्यावरण को बचाया जाए, जो न केवल लद्दाख बल्कि उत्तर भारत की जीवन रेखा है। यहीं से उत्तर भारत में बहने वाली नदियां निकलती हैं। यहां के ग्लेशियर ही इन नदियों के जलस्रोत हैं। विकास के नाम पर लद्दाख के बहुत ही नाजुक पर्यावरण के साथ खेल किया जा रहा है, जो हमारे लिए और आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत भयानक साबित होने वाला है। कार्पोरेट को बिना सोचे-समझे जमीनें दी जा रही हैं, यहां के पर्यावरण को नष्ट करने वाले उद्योग लगाए जा रहे हैं।
वे आगे कहते हैं कि भले ही इसके भयानक दुष्परिणाम आज न दिखें, लेकिन 30-40 सालों के भीतर सब कुछ तबाह हो जाएगा। इसे बचाना जरूरी है, न केवल लद्दाख के लिए बल्कि पूरे देश के लिए। ये बाते वांगचुक ने जनचौक से बात-चीत में दुहराई। हम सभी जानते हैं कि सोनम वांगचुक खुद ही एक बहुत ही संजीदा और विशेषज्ञ पर्यावरणविद हैं।
4- वे हर हालात में लद्दाख के लिए संविधान की छठीं अनुसूची के तहत संरक्षण चाहते हैं। इसके बारे में गृहमंत्री अमित शाह का कहना है कि यह किसी भी हालात में नहीं दिया जाएगा।
सोनम वांचुक कहते हैं कि गृहमंत्री अमित शाह ने तो लद्दाख के प्रतिनिधियों से यहां तक कहा कि यदि प्रधानमंत्री भी लिख के दे दें, तो भी हम लद्दाख को छठवीं अनुसूची नहीं प्रदान करेंगे। जबकि जम्मू-कश्मीर से धारा-370 खत्म करते समय इसका वादा किया गया था। यहां तक कि लद्दाख हिल्स काउंसिल का जब अक्टूबर 2020 में चुनाव हुआ तब भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में लद्दाख को छठी अनुसूची में डालने का वादा किया था। छठी अनुसूची लद्दाख के लोगों की सबसे बड़ी मांग है और पहले भी रही है।
5 अगस्त 2019 के बाद लद्दाखी प्रतिनिधियों और केंद्रीय गृहमंत्रालय के बीच कई दौर की वर्ता हुई। गृह मंत्रायल विभिन्न बहानों से पहले तो टालमटोल करता रहा, लेकिन अंत 4 मार्च ( 2023) को साफ तौर कह दिया कि हम चाहे कुछ भी हो जाए आपको संविधान की छठी अनुसूची नहीं प्रदान करेंगे।
इस पर टिप्पणी करते हुए वांचुक कहते हैं कि छठी अनुसूची की मांग सुनकर केंद्र सरकार को ऐसा लगता है कि जैसे हमने कोई पाकिस्तान का संविधान मांग लिया। जबकि हमारी संस्कृति-समाज के लिए यह सबसे बुनियादी जरूरत है। भारतीय संविधान की छठी अनुसूची के तहत पूर्वोत्तर के चार राज्यों- असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम में ‘स्वायत्त ज़िला परिषदों’ (Autonomous District Councils- ADCs) की स्थापना की गई।
जिन व्यक्तियों ने नरेंद्र मोदी सरकार सबसे अधिक नंगा किया है, उनके पाखंड को उजागर किया है, उनमें से एक सोनम वांचुक भी हैं। नरेंद्र मोदी सरकार उन्हें दंडित करने के मौके का तलाश कर रही थी। उसे वह मौका अब मिल गया है। लद्दाख ( लेह) में हुए प्रदर्शन, बगावत और हिंसा का सारा ठीकरा उनके ऊपर फोड़ा जा सकता है।















