वसुधैव कुटुम्बकम् और सैम पित्रोदा का बयान
भारतीय सभ्यता की सबसे बड़ी देन उसकी उदार दृष्टि है। यहाँ जीवन को कभी सीमाओं और स्वार्थों तक नहीं बाँधा गया, बल्कि समस्त सृष्टि को परिवार मानने की भावना पोषित की गई। महा उपनिषद में आया श्लोक “अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्, उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्” यही उद्घोष करता है कि यह मेरा है, वह तुम्हारा है—यह विचार छोटे मन वालों का है, जबकि उदार हृदय वाले लोग पूरी धरती को परिवार मानते हैं। इसी से निकला दर्शन है वसुधैव कुटुम्बकम्—एक ऐसी दृष्टि जो भारतीय संस्कृति को विश्वगुरु के रूप में पहचान दिलाती है। भारतीय संसद के प्रवेश द्वार पर यह वाक्य अंकित होना केवल प्रतीक नहीं, बल्कि उस राष्ट्रीय आत्मा का स्मरण है जिसने हमेशा मानवता को जोड़ने का कार्य किया।
लेकिन जब यही आदर्श व्यवहार में आता है, तो अक्सर विरोधाभास खड़ा हो जाता है। हाल ही में सैम पित्रोदा का बयान—“मुझे पाकिस्तान में घर जैसा महसूस होता है”—इसी विरोधाभास का ताज़ा उदाहरण है। सतही तौर पर यह वाक्य एक सरल मानवीय अनुभव प्रतीत होता है। किसी भी इंसान को दूसरे देश में अपनापन महसूस हो सकता है। और यदि हम वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श को ध्यान में रखें तो ऐसी भावना पर किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए? आखिर अगर पूरी धरती परिवार है, तो कोई भी देश घर जैसा क्यों न लगे?
लेकिन राजनीति और समाज केवल आदर्शों से संचालित नहीं होते। उनमें संवेदनाएँ, धारणाएँ और राष्ट्रीय गरिमा का प्रश्न जुड़ा होता है। यही कारण है कि पित्रोदा का कथन सुनकर बहुत से लोग आहत हो उठे। उनके लिए यह केवल व्यक्तिगत अनुभव नहीं रहा, बल्कि उस पड़ोसी देश के संदर्भ में कहा गया वाक्य बन गया जिससे संबंध हमेशा संवेदनशील रहे हैं। जनता के मन में यह आशंका उठती है कि कहीं इस कथन में राष्ट्रीय हित की अनदेखी तो नहीं है, कहीं यह किसी प्रकार का राजनीतिक संदेश तो नहीं देता। यही वह बिंदु है जहाँ दर्शन और राजनीति का टकराव स्पष्ट दिखाई देता है।
वास्तव में यह टकराव केवल भारत तक सीमित नहीं है। हर राष्ट्र में उच्च आदर्श और व्यावहारिक राजनीति के बीच यह खींचतान होती है। आदर्श हमें सीमाओं से परे देखने को प्रेरित करते हैं, जबकि राजनीति हमें सीमाओं के भीतर जिम्मेदारियों और सावधानियों की याद दिलाती है। भारतीय संस्कृति का सौंदर्य यही है कि उसने कभी इन दोनों को विरोधी नहीं माना, बल्कि संतुलन की तलाश की है। बौद्ध करुणा से लेकर गांधीजी की अहिंसा तक और आज के वैश्विक सहयोग तक, भारत ने हमेशा यही संदेश दिया है कि मानवता को जोड़ने का प्रयास हो, लेकिन राष्ट्रहित और गरिमा से समझौता न हो।
इस दृष्टि से देखें तो पित्रोदा का कथन न तो पूरी तरह गलत है और न ही पूरी तरह निर्दोष। उसमें उदार दृष्टिकोण की झलक है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में कहे गए शब्द केवल व्यक्तिगत नहीं रहते, वे राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन जाते हैं। इसलिए नेताओं और विचारकों की जिम्मेदारी है कि वे अपने शब्दों का चयन इस तरह करें कि आदर्श और व्यावहारिकता दोनों संतुलित रहें।
भारत को आज जिस मार्ग पर चलना है, उसमें वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना अनिवार्य है। यह हमें बताती है कि सीमाएँ हमें अलग नहीं कर सकतीं, मानवता का आधार एक ही है। लेकिन इसके साथ-साथ यह भी सच है कि किसी भी राष्ट्र की स्थिरता, सुरक्षा और सम्मान उसके आत्मसम्मान पर टिका होता है। यही कारण है कि हमें दोनों सत्यों को एक साथ स्वीकार करना होगा। आदर्श हमें दिशा देंगे और राजनीति हमें स्थिरता प्रदान करेगी।
अंततः कहा जा सकता है कि वसुधैव कुटुम्बकम् भारत का अमर संदेश है, लेकिन उसका सही अर्थ तभी समझा जाएगा जब हम उसे मानवता की एकता के रूप में देखें, न कि राष्ट्रहित की अनदेखी के रूप में। सैम पित्रोदा का बयान इसी द्वंद्व की याद दिलाता है—कि आदर्श और यथार्थ के बीच संतुलन साधना ही सबसे बड़ी कला है। यही सनातन का मर्म है और यही राजनीति का भी धर्म होना चाहिए।
✍️ अखिल कुमार यादव












