साल 1990 और तारीख 31 जनवरी। सरस्वती पूजा का दिन। जगह बिहार का मुजफ्फरपुर। शाम ढल रही थी। बाहुबली चंदेश्वर सिंह अपने काफिले के साथ छाता चौक इलाके से गुजर रहा था। 4 गाड़ियों में करीब 10-12 लोग। सभी के पास देसी पिस्टल।
अचानक चंदेश्वर की गाड़ी खराब हो गई। काफिला रुक गया और उसके गुर्गे गाड़ी में गड़बड़ी चेक करने लगे। चंदेश्वर ने भी उतरकर अपनी कमर सीधी की और जेब से सिगरेट निकाली।
एक गुर्गा भागकर आया और सिगरेट जलाने के लिए माचिस जलाने लगा। इसी बीच एक गोली उसकी पीठ पर लगी और सीना चीरकर निकल गई।
चंदेश्वर सिंह कुछ समझ पाता, उससे पहले ही ताबड़तोड़ गोलियों ने सबको छलनी कर दिया। कोई अपनी देसी पिस्टल निकाल भी न सका। जब सबकी लाशें सड़क पर बिछ गईं, तब गोलियों के धुएं के बीच से एक 6 फीट कद, काले घुंघराले बाल और गोरे रंग का शख्स कंधे पर AK-47 टांगे सामने आया।
उसने चंदेश्वर के सीने पर पैर रखकर कहा- ‘कहे थे न, आज ही के दिन मारेंगे।’ और AK47 की एक पूरी मैग्जीन उसके बदन में उतार दी।
देसी पिस्टल वाले बिहार ने पहली बार AK-47 की तड़तड़ाहट सुनी थी; और ये शोर करने वाला शख्स था, बिहार का सबसे बड़ा डॉन- अशोक सम्राट।
दैनिक भास्कर की इलेक्शन सीरीज ‘गैंगस्टर’ के पहले एपिसोड में कहानी बिहार के पहले डॉन ‘अशोक सम्राट’ की…
पुलिस को चंदेश्वर के शरीर में AK-47 की कुल 40 गोलियां मिलीं। पूरे बिहार में दहशत फैल गई कि अशोक सम्राट के हाथ AK-47 आ गई है। इस वारदात से पहले तक अशोक पर 40 से ज्यादा केस थे, मगर पुलिस के पास उसकी कोई तस्वीर नहीं थी।
वो कभी बुलेट मोटरसाइकिल, तो कभी खुली जीप में बेखौफ घूमता था। पहनावा फिल्मी हीरो जैसा। जब बिहार पुलिस उसे तलाश रही होती, तो वो राजधानी पटना के सैलून में घंटों बैठा रहता।
बिहार के पूर्व DGP गुप्तेश्वर पांडे बताते हैं, ‘बेगूसराय समेत आसपास के कई जिलों में अशोक सम्राट की ही बादशाहत चलती थी। पूरे इलाके का वही मालिक हुआ करता था। जिस रास्ते से उसका काफिला गुजरता, वहां किसी पुलिसवाले की ड्यूटी करने की हिम्मत नहीं होती। उसके ठिकानों पर दबिश देने के लिए कोई तैयार नहीं होता।’
बचपन में खुद को गोली मारी, पुलिस की नौकरी हाथ से गई
बेगूसराय जिले का सोखहारा गांव बड़ौनी रेलवे स्टेशन के करीब है। बेगूसराय को उस समय ‘मिनी मॉस्को’ या ‘बिहार का लेनिनग्राद’ कहा जाता था, क्योंकि ये कम्युनिस्टों का गढ़ था। यहीं जन्म हुआ अशोक शर्मा का। वो बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल था। उसने डबल MA किया। उसका सपना था- पुलिस की वर्दी पहनना।
बचपन से ही उसका गुस्सा आसमान छूने लगा था। छोटी-छोटी बात पर बिगड़ जाना, मारपीट करना उसके लिए रोज की बात होने लगी। इसी वजह से गांव के लोग उसे ‘अशोक पगला’ कहने लगे।
बड़ा हुआ तो उसे फुटबॉल का शौक चढ़ा। एक दिन फुटबॉल ग्राउंड पर ही उसकी मुलाकात रामविलास चौधरी से हुई। दोनों गहरे दोस्त बन गए और धीरे-धीरे दोनों हर काम साथ-साथ करने लगे। दोस्ती ऐसी कि गांव में मिसाल दी जाने लगीं।
लड़ाई अशोक करता, बदला लेने रामविलास पहुंच जाता। कभी रामविलास परेशान होता, तो अशोक मामला निपटाता। अशोक प्यार से रामविलास को ‘मुखिया’ या ‘मुखू’ कहता था।
पढ़ाई में तेज अशोक ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद सब इंस्पेक्टर भर्ती का पेपर क्लियर कर लिया। फिजिकल टेस्ट में भी पास हो गया, लेकिन इसी दौरान उसके जिगरी दोस्त रामविलास ने घर के झगड़ों से तंग आकर जहर खा लिया।
ये खबर सुनते ही अशोक बदहवास सा हो गया। उसने खुद को कमरे में कैद कर लिया। उसने कहा, ‘अगर मेरा दोस्त जिंदा नहीं रहेगा तो मैं भी मर जाऊंगा।’ और देसी कट्टे से अपने पेट में गोली मार ली।
लंबे इलाज के बाद दोनों बच गए, लेकिन अशोक का पुलिस की वर्दी पहनने का सपना हमेशा के लिए टूट गया।
खाद की चोरी से कम्युनिस्टों के दुश्मन बने
साल 1983-84, उस समय गांवों में खाद और बीज के गोदाम नहीं थे, इसलिए इसे सड़कों पर ही उतारा जाता था। अशोक ये बात जानता था।
वो रामविलास के साथ मिलकर रात में खाद चुराने लगा। इस काम में जितना मुनाफा था, उतना ही जोखिम भी। ऐसे में रामविलास ने उसे हथियार खरीदने की सलाह दी। अशोक ने एक बुलेट मोटरसाइकिल खरीदी और शान बढ़ाने के लिए खुली जीप भी ली।
अब तक दोनों बेगूसराय के कम्युनिस्ट व्यापारियों की नजर में आ चुके थे। उन्होंने दोनों के बीच फूट डालने का प्लान बनाया। अशोक तो जाल में नहीं फंसा, लेकिन रामविलास झांसे में आ गया।
एक दिन अकेला पाकर किसी ने रामविलास को खूब शराब पिलाई और नशे में धुत हो जाने पर कहा, ‘रामविलास, सब कुछ तो तुमने किया है। तुम्हारी वजह से ही नोटों की बरसात हो रही है। तुम ही सारा काम करते हो, लेकिन बॉस वो बन बैठा है। देखो नाम उसी का हो रहा है।’
ये बात रामविलास के दिमाग पर छप गई। वो हर किसी से कहने लगा कि वो अशोक का बॉस है। अशोक को जब ये पता चला तो दोनों दोस्तों के बीच दरार पड़ने लगी।
दोनों के बीच आए दिन झगड़े होने लगे। कई मौकों पर मारपीट भी हो गई। आखिरकार दोनों ने संपत्ति बंटवारे का फैसला कर लिया और नौबत पंचायत तक पहुंच गई। चूंकि रामविलास का साथ व्यापारी दे रहे थे, इसलिए सारे हथियार, जमीन, ट्रक, गाड़ी उसे मिले। अशोक को मिली केवल उसकी बुलेट मोटरसाइकिल और एक कबाड़ हो चुकी मैटाडोर।
जाहिर है रामविलास ज्यादा ताकतवर हो गया। मगर बंटवारे से झगड़ा खत्म होने के बजाय बढ़ गया। रामविलास ने अशोक को जान से मारने का फैसला कर लिया।
बचपन के दोस्त ने किया हमला, बेगूसराय छोड़ना पड़ा
बंटवारे में मिली मोटरसाइकिल से एक रात अशोक घर लौट रहा था। रास्ते में उसकी हेडलाइट खराब हो गई। दूर-दूर तक अंधेरा और घने जंगल के अलावा कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। अशोक रास्ते में ही बुलेट की हेडलाइट सुधारने लगा। तभी उसे एक ट्रक आता हुआ दिखाई दिया। ट्रक चलाने वाला विपिन सिंह रिश्ते में अशोक की भतीजी का पति था।
विपिन ने उससे कहा- ‘बुलेट का हेडलाइट बिगड़ गया है क्या? ऐसा कीजिए, आप बुलेट पर आगे-आगे चलिए, हम ट्रक लेकर पीछे से आते हैं।’
ट्रक कुछ दूर ही आगे बढ़ा था कि पीछे से एक जीप ओवरटेक करने की कोशिश करने लगी। जीप से लगातार लोग चिल्ला रहे थे, हॉर्न बजा रहे थे। विपिन समझ गया कि वो रामविलास के लोग थे जो अशोक पर हमला करने आए थे।
विपिन ने ट्रक बीच में ही अड़ा दिया और जीप को ओवरटेक नहीं करने दिया। जीप से फायरिंग शुरू हो गई। विपिन घायल हो गया, मगर अशोक ने बड़ौनी थाने के कैंपस में घुसकर अपनी जान बचा ली।
इस हमले के बाद अशोक को समझ आ गया कि आज तो जान बच गई, लेकिन अब बेगूसराय सुरक्षित नहीं। इसके बाद वो मुजफ्फरपुर निकल गया।
तिलक समारोह में घुसकर पूरे परिवार को खून से नहलाया
साल 1986। गर्मियों का दिन था।
मुजफ्फरपुर के एक बड़े बाहुबली चंदेश्वर सिंह के बेटे का तिलक चढ़ रहा था। घर में उत्सव का माहौल था और लगातार लोग आ-जा रहे थे। इसी भीड़ में अशोक भी शामिल था। एक घरवाले ने उसे शरबत पीने के लिए पूछा। अशोक ने मुस्कुराकर कहा- ‘शरबत नहीं, मुझे तो खून पीना है।’
पत्रकार ज्ञानेश्वर बताते हैं, ‘अशोक ने जेब से पिस्टल निकाली और वहां मौजूद लोगों पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दीं। उसके साथ उसका पार्टनर मिनी नरेश भी बेतरतीब गोलियां चलाने लगा। दोनों का निशाना बाहुबली चंदेश्वर था। गोलियों की आवाज से चंदेश्वर सतर्क हो गया और घर से भाग गया। मगर इस हमले में उसके परिवार के कई लोगों की जान चली गई।’
दरअसल, अशोक ने मुजफ्फरपुर आकर छात्र राजनीति के किंग मिनी नरेश से हाथ मिला लिया था। चंदेश्वर और मिनी नरेश का झगड़ा पुराना था। परिवार के लोगों की मौत से चंदेश्वर बौखला गया। 1989 में सरस्वती पूजा के दिन अशोक शहर में नहीं था। मौके का फायदा उठाकर चंदेश्वर पीजी हॉस्टल में घुस गया और मिनी नरेश को तलवार से टुकड़ों-टुकड़ों में काट डाला।
इस घटना से अशोक हिल गया। उसने ऐलान किया कि एक साल के भीतर मिनी नरेश का बदला लेगा। अगले सरस्वती पूजा के दिन ही उसने छाता चौक पर चंदेश्वर सिंह को AK47 से भून डाला और अशोक से अशोक सम्राट बन गया।
अब अशोक सम्राट का नेटवर्क इतना मजबूत हो चुका था कि उसने बिना बेगूसराय गए ही अपने बचपन के दोस्त और पुराने दुश्मन रामविलास चौधरी को मरवा दिया।
पहली नजर में बैंक अधिकारी की बेटी से प्यार हुआ
पटना के शास्त्री नगर के अलकनंदा अपार्टमेंट्स में अशोक सम्राट का ठिकाना था। इसी बिल्डिंग में वैशाली से आए शाही जी रहते, थे जो बैंक के अधिकारी थे। उनकी तीन बेटियां और पत्नी भी वहीं उनके साथ रहती थीं।
एक दिन बिल्डिंग के बाहर अशोक ने शाही जी की बड़ी बेटी भव्या (बदला हुआ नाम) को देखा। उसे पहली नजर में ही भव्या पसंद आ गई। इसके बाद दोनों की मुलाकातें होने लगीं। भव्या भी अशोक को पसंद करने लगी।
अशोक सम्राट के परिवार वालों ने कभी इस शादी को कबूल नहीं किया। हालांकि, भव्या के घरवालों ने सम्राट को दामाद के रूप में अपना लिया था।
शादी के बाद रिसेप्शन बेगूसराय के एक अन्य बाहुबली और नेता रतन सिंह के घर पर हुआ। ये वही रतन सिंह थे जिनके साथ अशोक ठेकों का काम किया करता था। ये रिसेप्शन भव्य था। पूरे बिहार के कई बड़े और नामी लोग इसमें शामिल होने पहुंचे।
लोग कहते हैं कि करीब 500 गाड़ियां रिसेप्शन हॉल के बाहर पार्क की गई थीं। सम्राट के इतने भव्य आयोजन के बावजूद बिहार पुलिस उस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर सकी।
विरोधी को चुनाव हराने के लिए पूरे गांव को धमकाया
शादी के बाद अशोक खून-खराबे की जिंदगी से दूर रहना चाहता था। इसके लिए उसे राजनीति का रास्ता मुफीद लगा।
1989 में उसने कांग्रेस के हेमंत शाही को सपोर्ट किया, मगर हेमंत चुनाव हार गए। इसके 2 साल बाद 1991 के चुनाव में कांग्रेस ने हेमंत की जगह विरोधी खेमे के रघुनाथ पांडे को टिकट दे दिया। अशोक को ये बात अच्छी नहीं लगी।
वो खुलेआम कांग्रेस के विरोध में उतर आया। वो मुजफ्फरपुर के भूमिहार इलाकों में जाकर कहता कि चुनाव के दिन वोट देने न जाएं। उसके डर से भूमिहर मतदान बहुत कम हुआ। आखिरकार रघुनाथ पांडे हारे और जॉर्ज फर्नांडिस जीत गए।
आखिरकार 1995 में वो खुद चुनाव में उतरा। इसके लिए मुजफ्फरपुर का कुढ़नी विधानसभा क्षेत्र चुना गया। अशोक चुनाव में निर्दलीय खड़ा हुआ। उसके सामने थे जनता दल के बसावन प्रसाद भगत, समता पार्टी के सिंहेश्वर सैनी और BJP के चंदेश्वर प्रसाद। चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी भव्या ने संभाली।
लेकिन कुढ़नी से जनता दल के बसावन प्रसाद भगत जीत गए, उन्हें 65,604 वोट मिले। वहीं, अशोक सम्राट को सिर्फ 25,124 वोट मिले।
पुलिस ने जिसका धोखे में एनकाउंटर किया, वो सम्राट निकला
5 मई 1995 की बात है। पटना पुलिस ने एक बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई।
DGP जीपी दौरे ने पत्रकारों से कहा, ‘कल वैशाली में हुए पुलिस एनकाउंटर में 3 वांटेड अपराधी मारे गए हैं। इनमें अनिल शर्मा और रामा सिंह की पहचान हो गई है, जबकि तीसरे की पहचान नहीं हो पाई है। इस एनकाउंटर में 2 कॉन्स्टेबल भी घायल हुए हैं। अपराधियों के पास से पिस्टल, राइफल और जिंदा कारतूस भी बरामद किए गए हैं।’
पुलिस जिस तीसरे अपराधी की पहचान नहीं कर पाई थी, उसका चेहरा पत्थर से कुचला हुआ था। पुलिस ये पता करने में जुट गई कि ये तीसरा आदमी कौन है।
इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से ठीक एक दिन पहले अशोक सम्राट एक रेलवे टेंडर के सिलसिले में पटना से सोनपुर के लिए निकला था। वो सुबह नाश्ता करके नीले रंग की मारुति कार से घर से निकला। उसके साथ 5 और गुर्गे आगे दूसरी गाड़ी में थे।
जब वो पासवान चौक पर पहुंचा तो पुलिस इंस्पेक्टर शशि भूषण शर्मा ने इनकी गाड़ी को रोक लिया। अशोक पुलिस ने टकराना नहीं चाहता था, सो उसने गाड़ी दूसरी ओर मोड़कर भगा दी। पुलिस फौरन उनके पीछे लग गई।
भागते हुए अशोक की मारुति वैन एक पत्थर से टकराकर पलट गई। अब सभी लोग नीचे उतरकर सड़क पर दौड़ने लगे। पुलिसवाले भी उनका पीछा करने लगे। उन्हें डराने के लिए पुलिस ने हवाई फायरिंग भी की, लेकिन अशोक और उसके लोग नहीं रुके। ये भागम-भागम भीषण गर्मी में खुले खेतों में चल रही थी।
इन दिनों आसपास के कई गांवों में डकैती की वारदात हुई थी। इसी का फायदा उठाते हुए पुलिस पीछे से डकैत-डकैत चिल्लाने लगी। ये सुनकर गांव वाले भी पुलिस की मदद के लिए अशोक और उसके साथियों का पीछा करने लगे। हालांकि, अभी तक पुलिस को पता नहीं था कि वो अशोक सम्राट का पीछा कर रही है।
दौड़ते-दौड़ते सभी मानसिंहपुर रसौली गांव पहुंच गए। उन्होंने एक खाली घर देखा और उसमें छिपने चले गए। यह घर विधवा शकुंतला देवी का था। जब सभी घर में घुस रहे थे, तो गांव के एक आदमी ने इन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन अशोक के साथियों ने उस पर गोली चला दी। इससे ग्रामीणों का गुस्सा बढ़ गया।
जब सभी घर में घुसे तो शकुंतला देवी घर के बाहर आ गईं और घर का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया। अब अशोक सम्राट अपने साथी कांता सिंह, विनोद सिंह और एक अन्य साथी के साथ घर के अंदर बंद हो गया।
कुछ ही देर में पुलिस भी वहां पहुंच गई। गांववालों ने उन्हें बाहर निकालने के लिए घर में आग लगा दी। चारों फायरिंग करते हुए घर से बाहर निकले। पुलिस ने भी जवाबी फायरिंग की जिसमें चारों मारे गए।
एक गोली अशोक सम्राट के चेहरे पर लगी। गांववालों ने उसका चेहरा भी बिगाड़ दिया। पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस मुठभेड़ की जानकारी दी तो अशोक के घरवाले भी लाश की पहचान के लिए पहुंचे। घरवालों ने बताया कि वो तीसरी लाश जिसकी पहचान में पुलिस जुटी थी, वो अशोक सम्राट की थी।
पुलिस महकमे के लिए यह एनकाउंटर इतना महत्वपूर्ण था कि इसे अंजाम देने वाले इंस्पेक्टर शशिभूषण शर्मा को सीधे DSP बना दिया गया।
अशोक अगर उस दिन एक किलोमीटर और भाग लेता तो अपनी पत्नी के गांव पहुंच गया होता।

news xprees live















